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आश्विन संक्रांति का देवोत्सव है सायर
September 17, 2020 • Havlesh Kumar Patel • Himachal
डा हिमेंद्र बाली 'हिम', शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।
 
हिमाचल प्रदेश में वर्ष भर पर्व और त्यौहार आयोजित होते रहते हैं। यहां का हर पर्व, त्यौहार व मेला स्थानीय देवी देवता की पूजा अथवा उपस्थिति से सम्पन्न होता है। आश्विन मास की संक्रांति को यहां सायरी अथवा सैर का त्यौहार मनाया जाता है। इधर सतलुज घाटी के कुमारसैन, बड़ागांव सांगरी, कुल्लू के बाहरी सिराज के आनी, निरमण्ड और मण्डी के सुकेत क्षेत्र की करसोग तहसील के सतलुज घाटी क्षेत्र के चवासी व बगड़ा गढ़ क्षेत्र में सायरी के त्यौहार को शैरी का साजा नाम से त्यौहार मनाने की परम्परा है।
सतलुज घाटी के क्षेत्र में आश्विन संक्रांति को बड़ी संक्रांति अर्थात् बड़ा साजा कहा जाता है। इस दिन घरों को पवित्र कर आंगन में मांदला अर्थात् मण्डप को गोबर से आलेपित किया जाता है। मांदला पर गोबर के गणपति को स्थापित कर द्रुवा घास को संलग्न किया जाता है। कुल पुरोहित घर आकर प्रत्येक द्वार का विधिवत् पूजन करता है। यजमान की इच्छा से घर में हवन भी किया जाता है। तेबन के शाड़ा गांव के पुरोहित बोधराज शर्मा का कहना है कि कुल पुरोहित यजमानों के घर जाकर द्वार पर पुष्प-अक्षत आदि से पूजन कर हवन कर गृह शुचिता व शांति के निमित देवी देवता का आह्वान करता है। अनुष्ठान के बदले यजमान ब्राह्मण को भोजन व द्रव दान से संतुष्ट करता है।
सतलुज घाटी के बड़ागांव सांगरी, कुमारसैन और सुकेत क्षेत्र में इस दिन घर में गृह देवता और पितर देव की विशेष पूजा की जाती है। बड़ागांव सांगरी के संस्कृतिवेत्ता अमर सिंह ठाकुर के अनुसार इस दिन गृह देवता के निमित्त नैवेद्य बनाकर अर्पित किया जाता है। परिवार के पित्तर देवों को गौण देव कहा जाता हैं, इन्हे भी लुची अर्थात् घी में रोटियां बनाकर अर्पित की जाती है। सांगरी में गृह देवता और पितर जिन्हे नेऊआ कहा जाता है। घर की ऊपरी मंजिल दड़क में एक पीठिका में एक साथ प्रतिष्ठित किया होता है। पितरों के निमित्त यह पूजा परिवार के स्वास्थ्य व सुख समृद्धि के लिए शुभ मानी जाती है। बड़ी संक्राति होने के कारण इस दिन सतलुज घाटी के कुमारसैन क्षेत्र में कुलदेव व कुलदेवी पूजन का विधान हैै। परिवार के पुरूष ही परिवार में प्रतिष्ठित देवी-देवता की पूजा करते हैं।
कुमारसैन के लाठी गांव के दिनेश भारद्वाज का कहना है कि इस दिन परिवार में पूजित देवी देवताओं के निमित नैवेद्य बनाकर पूजा की जाती है। कुमारसैन क्षेत्र के जार गांव के अनिल कुमार का कहना है कि संक्रांति के दिन परिवार के देवी देवता के मंदिर में पूजा हवन पूरी बिरादरी के लोगों द्वारा की जाती है। इस दिन लोग क्षेत्र के अधिपति कोेटेश्वर महादेव के मंदिर में जाकर आशीष ग्रहण करते हैं। कुमारसैन में बैसाख, कार्तिक,आश्विन और माघ मास की संक्रांतियों को बड़ी संक्रांति माना जाता है, इस दिन कोटेश्वर महादेव अपनी कोठी मढोली से चिंह रूप विग्रह जगुंठ के साथ अपने प्राकट्य स्थल कोटी में वाद्य यंत्रों की पारम्परिक धुन के साथ पहुंचते हैं और यहीं देवता के गूर देवारोहण में आशीष प्रदान करते हैं।
वास्तव में सायर ऋतु परिवर्तन का त्यौहार है। कुल्लू क्षेत्र में सायर के त्यौहार को शौइर कहा जाता है। शौइर को शरद ऋतु का अपभ्रंश माना जाता है। बरसात की समाप्ति पर आयोजित सायर का त्यौहार वास्तव में शिशिर ऋतु के आगमन की सूचना देता है। सायर त्यौहार भूमि पूजन से भी जुड़ा है। मण्डी में इस दिन घर में एक कक्ष में मण्डप को गोबर से लीप कर उस पर कद्दू, खट्टे फल व ऋतु फल रखे जाते हैं, साथ ही ऋतु फसल का अंश समेत सभी को कपड़े में लपेटकर रखकर पूजा की जाती है। बाघल रियासत के अर्की में इस दिन भैसों की लड़ाई का आोजन किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि भैसों की लड़ाई के खेल को देखने से राहु केतु जैसे ग्रहों का प्रकोप मिट जाता है। मण्डी में सायरी की सुबह नाई टोकरी (जिसे किरनी कहा जाता है) में खट्टा फल (गलगल या नींबु, जौ व अन्य अनाज की बालियां और सिंदर आदि पूजा का सामान होता है) को लेकर रात के समय कृषकों के घर जाते हैं। वे हाथ में लालटेन लिए चलते हैं और सायर का वंदन करवाते हैं। जौ और अन्य आनाज की बालियों का अर्थ सम्पन्नता से सम्बद्ध है। खट्टा  प्रजाति के फल में बीजों की बहुतायत होती हैै।
अतः परिवार के लोगों की वर्ष में वंश वृद्धि की कामना की जाती है। टोकरी में रखे फल उन फलों के प्रतीक हैं, जिन्हे फसल रूप में एकत्रित किया जाना होता है। इस दिन पकवान बनाए जाते हैं और परोसे जाते हैं। टिड्डियों की चहचहाट से यह माना जाता है कि अब सुखमय दिनों का आरम्भ हो गया है। इस अवसर पर यह गीत गाया जाता है-
घरा घरा रा भेती ऐ भेरे सेरिया फीजुआ
चुलिया चुलिया दा भेती मेरे सेरी रे फीजुआ
अर्थात् फीजू चिड़िया घर-घर और चूल्हे चूल्हे को जानती है। इस प्रकार सायरा अथवा सैर या शैरी साजा ऋतु परिवर्तन का त्यौहार है, जिसमें देव व पितरपूजन का भाव इस प्रयोजन से निहित है कि हम बरसात की आपदा से सुरक्षित ईश कृपा से निकल आए हैं। इस अनुग्रह के लिए देवी-देवता का आभार व्यक्त करने के लिए पूजा अर्चना किये जाने की सदियों पुरानी परम्परा है। साथ ही बरसात की उमस के बाद शिशिर के आनंदमयी मौसम का आह्लाद लोगों में खुशी व आभार का भाव भर देता है।
 
मुख्य संपादक स्वर मदुला एवं अध्यक्ष सुकेत संस्कृति एवं जनकल्याण मंच कुमारसैन (शिमला) हिमाचल प्रदेश