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आत्म चिन्तन की जरूरत
October 5, 2020 • Havlesh Kumar Patel • social

कूर्मि कौशल किशोर आर्य, शिक्षा वाहिनी सामाचार पत्र।    

देश के कूर्मि समाज जब तक विभिन्न शाखाओं, उपजातियों और संगठनों में बटकर खुद को सर्वश्रेष्ठ और कूर्मि समाज के दूसरे शाखाओं के सदस्यों को नीच अप्रतिष्ठित समझता रहेगा, तब तक ऐसा होता ही रहेगा। देश के सबसे पुराने कूर्मि समाज के संगठन अखिल भारतीय कूर्मि क्षत्रिय महासभा की स्थापना 1894 ई में की गई। कूर्मि कुल गौरव कोल्हापुर के महाराजा और आरक्षण के जनक छत्रपति शाहूजी महाराज और सरदार वल्लभभाई पटेल की पुत्री मणिबेन पटेल ने महासभा की अध्यक्षता की थी, परन्तु कालांतर कूर्मि समाज का यह प्रमुख संगठन किन्हीं कारणों से कूर्मि समाज के बीच उतना लोकप्रिय नही बन पाया, जितना होना चाहिए था। इसके विपरीत अखिल भारतीय कूर्मि क्षत्रिय महासभा की स्थापना के 11 वर्ष बाद 1875 ई. में कांग्रेस की स्थापना की गई और उसने भारत पर करीब 65 वर्ष राज किया। आज भी कई राज्यों में उनकी सरकार है। यह तो तब है, जब कांग्रेस के पास कोई निश्चित वोट बैंक नहीं था, परन्तु हमारे कूर्मि जाति की आबादी करीब 20-25 करोड़ होने बावजूद देश बहुत से गाँव-शहर के लोग कूर्मि को जानते तक नहीं। महासभा समेत कूर्मि समाज के अनेक संगठन आपस में संगठित और मजबूत नहीं रहने के कारण शासन-प्रशासन व सरकार के सामने ठीक से आवाज तक नहीं उठाई जा रही है।
     जानकारों की मानें तो इसका बहुत बड़ा कारण ये है कि कुर्मी समाज के लोगों में अपनी जाति के लोगों को सम्मान देने, उनका सहयोग करने और दुःख-सुख में उनका साथ देने की भावना, संवेदना व इच्छाशक्ति अपेक्षाकृत कम है। जब तक हम लोग सवर्णों की तरह खुद को मानसिक, वैचारिक, बौद्धिक रूप से समझदार और मजबूत नहीं बना लेते हैं, तब तक कोई अपेक्षित कोई परिणाम  मिलेगा, इसकी उम्मीद कम ही है। इसके लिए हर कूर्मि समाज के लोगों को दूसरे कूर्मि को सहयोग करने के लिए बिना भेदभाव के ब्राह्मणों सहित अन्य सवर्णों की तरह कूर्मिवाद का सहारा लेना होगा। समाज के लोग चाहे वे किसी भी शाखा या उपजाति के हों और किसी भी स्थिति में हों, चाहे वे किसी राज्य के वासी हों, चाहे वे गरीब हो या अमीर, किसान, मजदूर हों या नेता हों या अफसर। सभी को जरूरत पड़ले पर तन-मन-धन से मदद करने के लिए समय बर्बाद किये बिना तैयार रहना होगा। माना जाता है गुजरात के पाटीदार समाज के लोगों में मदद करने के भाव के कारण पाटीदार कुर्मियों की उन्नति का मुख्य कारण है, लेकिन हम और हमारे समाज के लोग सब कुछ जानते-बूझते भी आपस में संगठित और मजबूत नहीं हो पा रहे हैं। एक-दूसरे का ख्याल नहीं रख पा रहे हैं, एक दूसरे की मदद नहीं कर पा रहे हैं और न ही एक-दूसरे के दुःख-सुख में शामिल हो पा रहे हैं। अगर यही हाल रहा तो हमलोग अपने समाज के अन्य कमजोर लोगों को कैसे संगठित और मजबूत रख पाएंगे? कैसे देश के 85 प्रतिशत बहुसंख्यक बहुजन मूलनिवासी समाज के साथ सामन्जस्य बनाकर सत्ता पर अधिकार कर पाएंगे? यह बहुत आवश्यक और विचारणीय सवाल है। माना जाता है कि कूर्मि जाति पिछड़े समाज की अन्य जातियों में श्रेष्ठ, गौरवशाली, स्वाभिमानी और जागरूक है, जो कुछ मामलों में सवर्णों से भी बहुत आगे है। 
जात से जमात की ओर
जब हम कूर्मि समाज के लोग आपस में संगठित और मजबूत होकर अपनी जात से जमात (दूसरी जाति) को और बढ़ेंगे तो हर कुर्मि छत्रपति शिवाजी महाराज या लौहपुरूष सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसे कूर्मि कुल गौरव का प्रतिरूप होेगा, जो समाजोपयोगी, देशोपयोगी महान काम करने के कारण अपने कुल, जाति के साथ ही समाज और देश का नाम रौशन कर सकेगा। 
संघे शक्ति कलियुगे      
इस लेख का सार यही है कि ष्संघे शक्ति कलियुगेष् यानी इस कलियुग में संगठन में ही शक्ति है। घर-परिवार हो या सामाजिक, जातीय या राजनैतिक संगठन हो या लोकसभा, विधान सभा या अन्य कोई सदन हो, हर जगह संगठन, एकता बहुमत से हर काम सफल होते हैं। यानी एकता बनी रहेगी तो हर विकास और मजबूती बनी रहेगी। इसके विपरीत ष्घर फूटे गंवार लूटेष् यानी घर-परिवार, संगठन में आपस में फूट, लड़ाई होने से दूसरे लोग इसका फायदा उठाते हैं, और जब तक बात समझ में आती है तब तक सब कुछ समाप्त हो गया होता है। घर-परिवार, समाज, कार्यालय, सामाजिक, जातीय संगठन हो या राजनैतिक संगठन हो, हर जगह एकता और संगठन की महत्ता सर्वविदित है, परन्तु आज हमारा कुर्मि समाज उच्च शिक्षित समाज होने के बावजूद इस छोटी सी, परन्तु आवश्यक बात को भूला हुआ है। इसका परिणाम सबके सामने है। 
अगर हमलोग खुद पर नियंत्रण रखते हुए अध्यात्म की शरण में जाते हैं और गौतम बुद्ध, संत कबीर और अन्य समाज सुधारकों के बतायें रास्ते पर चलते हैं तो मन-मष्तिक, घर-परिवार, समाज-संगठन, राजनैतिक और अन्य सभी समस्याओं का समाधान खुद ब खुद निकल जाएगा। भारत के लोकतांत्रिक व्यवस्था चलाने के चारों आधार स्तम्भ विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और पत्रकारिता के क्षेत्र की सारी गड़बडियों व समस्याओं का समाधान मनुष्य के विचार शुद्ध होने के साथ स्वयं हो जाएगा। समाजसुधारकों ने हर मौके पर सीख दी है कि सिर्फ धन कमाने की मशीन नहीं बनकर एक अच्छा-सच्छा और जिम्मेदार इंसान बने, लेकिन इसके लिए समय निकालकर गौतम बुद्ध और संत कबीर के उपदेश, वाणी को सुनना और समझना होगा। हर दिन अपने एक अवगुण को समाप्त करने का संकल्प लेना होगा। इतना ही नहीं, ऐसा करने के लिए दूसरों को भी प्रेरित करना होेगा। फिर देखिये कैसे व्यक्ति में बदलाव शुरू होकर समस्या समाप्त हो जायेगी। 
आत्म चिन्तन करें
हर व्यक्ति आत्म चिन्तन करें, अपनी गलतियों, खूबियों-खामियों पर दृष्टि डालें, खुद की पहचान करे। प्रकृति ने मानव को सबसे बुद्धिमान प्राणी बनाकर भेजा है। मानव की तरह धरती पर कोई भी नहीं है। अगर इस जीवन को सिर्फ अपना और अपने परिवार का पेट पालने में ही लगाकर समाप्त कर डालते हैं तो हममे और पशु-पक्षी और जानवर में क्या फर्क रह जाएगा? क्योंकि इतना काम तो पशु-पक्षी और जानवर भी करते हैं। हमें अपने अस्तित्व के प्रति जवाबदेही निभानी चाहिए।  

संस्थापक राष्ट्रीय समता महासंघ व सह राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी अखिल भारतीय कूर्मि क्षत्रिय महासभा