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आयुर्वेद चिकित्सा को बढाना हमारी सोच होनी चाहिए
July 2, 2020 • Havlesh Kumar Patel • miscellaneous
आशुतोष, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।
 
प्राकृतिक और आयुर्वेद चिकित्सा में सारे गुण और औषधि मौजूद है, जरूरत है विश्वास करने की। यह हमारी परंपरागत औषधि है, जिससे वोकल और लोकल को बढ़ावा देने के सारे गुण हैं। हमें तुरंत एक्शन की आदत हो गयी है, जिसका बहिष्कार किया जाना चाहिए। 
आज पूरा विश्व जहाँ एक दवा नहीं खोज पायी वही हमारे योग और प्राकृतिक औषधि ही जीवन रक्षक बनी हुई है। हमारी रोग निरोधक क्षमता को बढ़ाने का सरल माध्यम योग और प्राकृतिक औषधि है। पतंजलि ने तो शायद कोरोना की दवा भी बना ली है। अब देखना है कि यह कितना कारगर होता है और सफल। ऐसे समय में  अगर यह प्रयोग सफल और सार्थक होते है तो भविष्य के लिए हमारी प्राकृतिक चिकित्सा में चार चाँद लगना लाजिमी है।
आदिकाल से ही हम लोग प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति का उपयोग करते आ रहे है, जिसे आधुनिक काल में आर्युवेद कहा जाता है। यह पद्धति पूर्ण रूप से वन से प्राप्त पौधो के जड़ों, पत्ती, छाल, रस, फल, बीज आदि से तैयार औषधि पर निर्भर है, जिसका विस्तृत ज्ञान होना अनिवार्य है। पहले के लोग अनुभव और लंबी आयु के होते थे, उन्हें पौधो का ज्ञान और गुण पता होता था, जिससे उपचार संभव था। दूसरा कारण था कि उस समय कोई विकल्प मौजूद नहीं थी। आज विकल्प ही विकल्प है, इसलिए यह पीछे जा रहा है। दूसरी इसके इफेक्ट में समय लगता है, जबकि अन्य उपचार में समय कम लगता है। पहले विभिन्न प्रकार की प्रणाली नही थी वैद्य ही सभी तरह की औषधि रखकर इलाज करते थे। नाड़ी की रफ्तार से बीमारी की पहचान की जाती थी और फिर उपचार जो काफी समय भी लेता था। आजकल लोग जरा सा कष्ट बर्दाश्त नही करते तो इतना इंतजार कहां कर पाएँगे। जबसे एलोपैथ ने पाँव फैलाया वैद्य की संख्या कम होती गयी अब तो ढूँढे भी नहीं मिलते। वैसे वैद्य का प्रत्यक्ष उदाहरण रामायण में भी मिलता है। जब लक्ष्मण को शक्तिबान लगी थी और वे मुर्छित थे तो वैद्य ने ही उनकी इलाज की और वे ठीक हुए। 
हमारे देश में अनेक प्रकार की औषधिय पौधे पाए जाते हैं, जिसका संपूर्ण ज्ञान ही हमें उसका उपयोग बता सकता है। इन सब पौधो पर शोध और अनुसंधान कर इनके गुणो का पता करना अब आयुर्वेद पद्धति ने ली है और तरक्की भी किया है, लेकिन जहाँ तक वैद्य का सवाल है तो वो ढूँढे भी नहीं  मिलते। हाँ! एक बात है दातुन, चिडैता, गुलेच आदि का इस्तेमाल आज भी लोग कर लेते हैं।
 
                                  पटना बिहार