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अहिल्या चालिसा
June 26, 2020 • Havlesh Kumar Patel • poem

डाॅ दशरथ मसानिया,  शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

होल्करों के वंश में, अहिल्या भइ महान। 
भारत भूमि धन्य करि, कीना जन कल्याण।
चौड़ी गांव जनम भयो, इंदुर की थी रानि। 
शव की मूरति हाथ में, न्याय किया था आनि।। 
खांडेराव युद्ध गये, पीछे गये मल्हार। 
मालेराव बीस विदा, बेटी मुक्ताहार।। 
जय जय जय अहील्याबाई 
तिहरी कीरति सब जग छाई। 1
कोख सुशीला से जग पाया।
पिता माणको की तम माया। 2 
धनगर ग्वाला की तुम बेटी। 
भीमा वामा तुम से छोटी। 3 
चौड़ी गांव जनम तुम्हारा 
सुंदर जस छाया संसारा। 4 
बालपने की कथा पुरानी। 
शिव को अर्पण कीना पानी। 5 
रावमल्हारा आपहि देखा। 
शारद दुर्गा कन्या भेखा। 6
उमा रुप पाया महरानी। 
गाथा आपन कवी बखानी। 7 
खांडेराव संग भवानी। 
चौड़ी से रथ इंदुर आनी। 8 
काशी मंदिर को बनवाया। 
शिव की मूरति को सजवाया। 9 
गंगा रेवा घाट बनाये। 
बापी कूआ बहुत खुदाये। 10 
इंदुर राजा कीथी रानी। 
माहेश्वर कीनी रजधानी। 11 
प्रजा कारणे कष्ट उठाया। 
देवी माता का पद पाया। 12 
शिव का पूजन करती रानी। 
ता पीछे वे पीती पानी। 13 
चारो धाम बारह शिवालय। 
सात पुरी में निर्मित आलय। 14 
घाट-घाट पे नाम तिहारा।
बाट-बाट गावे संसारा। 15
यशवंतराव वीर प्रतापी। 
जिनको तुमने कन्या सौपी। 16 
भरतापुर की करी चढ़ाई। 
शत्रु से पति धोखा खाई। 17
धीरे-धीरे जम का आना। 
खांडेरावा कीन पयाना। 18
मांग सिंदूर पोछा रानी। 
भीषण संकट आंखों पानी। 19 
देव सरीखे ससुर तुम्हारे। 
हक दे दीने तुमको सारे। 20 
मालेरावा कालहि खाना। 
मुक्ता ने भी कीन पयाना। 21 
पूत-पिता पति ससुर जमाई।
बेटी की भी चिता बनाई। 22
दुश्मन ने जब आंख दिखाई। 
ज्वाला से उनको उड़वाई। 23 
अपना पौरुष आन दिखाया। 
तुम्हरे बल से जग थर्राया। 24 
माले मुक्ता की हो माता।
जीवन भर झेले संतापा। 25 
राघोबा को मार भगाया। 
चंद्रावत को सबक सिखाया। 26 
प्रजा तुमहि संतान सी पाला। 
दुष्टन को तो जेल मे डाला। 27 
नवदुर्गा को रूप बनाई। 
शैलसुता बन चौडी आई। 28 
कन्या रूप बनी ब्रह्मचारिणी। 
चंदा घंटातुम जग तारिणि। 29 
मां कुष्मांडा रुप बनाया।
पति सेवा में ध्यान लगाया। 30 
इस्कंद बन गृहस्थी चलाती। 
लालन को तो दूध पिलाती। 31 
अन्यायों से लडी भवानी। 
कात्यायन सी बन के आनी। 32 
दुश्मन को भी मार गिराया।
काली का जब रुप बनाया। 33 
बेटी को जब राह बताया। 
जय गौरी जगदंबे माया। 34
माता नानी का पद पाया।
सिद्धी दाती तेरी छाया। 35 
तुमसा कौन जगत में माता
 न्याय धरम करमो की थाता। 36 
तीस बरस तक शासन कीना। 
सत्तर आयु में ब्रम्ह लीना। 37 
काली लछमी मा की ममता।
प्रातः उठके तुमको भजता। 38 
जय जय जय माता कल्याणी।
सेवा सत्य शील गुण रानी। 39 
दास मसानी ने पद गाया। 
बेड़ा आपन पार लगाया।। 40 
पूत पति अरु ससुर को, कंधा दीना आप। 
मातु नर्मदा सेवती, खूब सहे संताप।। 
पेड़ लगाये आपने, खोदे कूप हजार। 
परजा सुख को जानकरि, कीने काम अपार।। 
बेटी से देवी बनी, माता का वरदान। 
सत्रह सौ पिंचाणवे, रानी का निर्वाण।। 

आगर (मालवा) मध्य प्रदेश