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अलग-अलग समय पर सब अलग-अलग रूप से महिला प्रताड़ना का आनंद लेते हैं
October 1, 2020 • Havlesh Kumar Patel • National
प्रभाकर सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।
 
लोग कह रहे हैं कि दलित थी इसलिए रेप करके मार दिया गया। कुलदीप सेंगर ने तो एक लड़की ही नहीं, पूरे खानदान को खत्म कर दिया। वो लड़की कौन जात थी? चिन्मयानंद जिस लड़की के मामले में बरी हो गए, वो लड़की कौन जात थी? मैं आप सबसे पूछता हूँ कि इस देश में कौन जात की लड़की सुरक्षित महसूस करती है? सरकार किसी की हो, उसमें सभी जातियों के नेता होते हैं। वो नेता सरकार में रहते वक़्त अपनी जातियों के हत्या और बलात्कार पर कुछ नहीं बोलते। उन्हें सत्ता की शक्ति और अंतहीन सुविधा बड़ी प्यारी चीज होती है, लेकिन जब वो विरोधी पक्ष में होते हैं तो उन्हें अन्याय दिखने लगता है। 
आप कल्पना कीजिये कि समय-समय पर ब्राह्मणों की हत्या, राजपूतों की हत्या, मुसलमानों की हत्या, दलितों की हत्या, यादवों की हत्या या तमाम अस्मिता वाले लोगों की हत्या एवं बलात्कार न हों तो उन्हें लोग नेता क्यों मानेंगे। सभी जाति के नेताओं के लिए अपनी जाति के लोगों का मारा जाना या प्रताड़ित किया जाना लाटरी लग जाने जैसा होता है। सेंगर मामले को पूरी दुनिया देख रही थी। क्या नतीज़ा निकला, सब आपके सामने है। फिर यह तो लड़की दलित जाति से थी ही। 
दरअसल दो ही विचारधारा है या तो सही या गलत। या तो आप लड़कियों को बराबर समझते हैं, या नहीं समझते हैं, फिर चाहे वो किसी जाति की हो। जेएनयू की लड़कियों को पूरे देश में रंडी और वेश्या के रूप में प्रचारित किया गया। पूरा देश तमाशा देखता रहा। जेएनयू में लड़कियां कहाँ से आती हैं? इसी समाज से। फिर भी यह समाज लड़कियों के पीटे जाने पर, गाली देने पर खुशियाँ मनाता है। यहाँ तक संवैधानिक पद्धति से चुने गए प्रतिनिधि तक इसका आनंद लेते हैं। ऐसे में क्या आपको मनीषा बाल्मीकि के मृत्यु पर दुःख व्यक्त करने का अधिकार है? मेरे हिसाब से तो नहीं है। अगर फिर भी दुःख व्यक्त करने का नाटक कर रहे हैं तो इसका सीधा मतलब है कि अब कुछ नेता न्याय माँगने के नाम पर दलाली करेंगे और अगले बलात्कार का इंतज़ार, क्योंकि जब पूरा समाज ही महिला-विरोधी है तो क्या दलित, क्या सवर्ण और क्या अल्पसंख्यक। 
हम सब अलग-अलग समय पर अलग रूप से महिला प्रताड़ना का आनंद लेते हैं। आज आप दुःखी हैं फिर पीड़ित का जाति बदल जाएगी फिर वे दुःखी हो जाएंगे। मुझे तो बस यही कहना है। मनीषा बाल्मीकि ने अपनी पूरी शक्ति से अपने खिलाफ़ होते हिंसा के खिलाफ़ लड़ी और अंत तक गुंडों को एहसास दिला दिया कि अगर वो बची तो उन गुंडों के खिलाफ़ बोलेगी, इसलिए ना जीभ भी काट दिया गया। मगर आप तो तलवे चाटने और दलाली खाने के लिए सत्ता के सामने कटा हुआ ही जीभ लेकर घूमते रहते हैं। फिर भी कुछ नहीं होता तो इंतज़ार करते हैं कि आपके जाति के साथ अन्याय हो क्यों नहीं रहा।
 
शोध छात्र इलाहाबाद विश्वविद्यालय उत्तर प्रदेश।