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और बेहतर भी हो सकती है आज़ादी
August 15, 2020 • Havlesh Kumar Patel • National
सलिल सरोज, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।
 
हमारे मुल्क को आज़ाद हुए आज 73 वर्ष पूरे हो गए हैं और एक और स्वतंत्रता दिवस दरवाजे पर दस्तक दे रहा है। क्या मायने हैं आज़ादी के ,इसका लेखा जोखा बहुत लंबा और विस्तृत हो सकता है लेकिन मेरे मन में जो बात ऐसे विषयों पर लिखते समय कौंध जाती है वो है -एक साधारण सी स्त्री और उसकी आज़ादी।  क्योंकि स्त्रियों को समाज के कई वर्गों द्वारा मूक पशु से भी कमतर समझा जाता है और उसी तरह उनके साथ व्यवहार किया जाता है। यदि हमारे समाज और देश के सबसे पिछड़े और कमजोर वर्ग का कोई उत्तराधिकारी हो सकता है तो वो केवल और केवल यहॉं की महिलाएँ ही हो सकती हैं। भले ही आप महिलाओं को चरणबध तरीके से कई खेमों में बाँट लें जैसे कि गरीब महीला, आदिवासी महिला ,दलित महिला ,शूद्र महिला,परित्यक्त महिला ,विकलांग महिला ,शोषित महिला ,मूक-वधीर महिला हालाँकि इन शब्द युग्मों में महिला ही सब दोषों की पीड़िता पाई जाती है। किसी भी राष्ट्र की आज़ादी का मापक मैं समझता हूँ सिर्फ और सिर्फ तीन चीज़ों पर निर्भर करता है - स्वास्थ्य ,शिक्षा और स्त्री और एक वाक्य में कहें तो जिस देश की स्त्रियाँ स्वस्थ ओर शिक्षित हैं वह राष्ट्र चाहे न्यूज़ीलैण्ड हो या अमेरिका हो ,स्वतंत्रता को सही रूप में हासिल कर पाया है। आज़ादी केवल विचारधारा की बहती हुई गंगा नहीं है जो शिव की जटाओं में सुशोभित रहे बल्कि उस गंगा को हकीकत की ज़मीन पर भी उतरना होगा और अपनी उपयोगिता और सम्यपरकता को भी साबित करना होगा। स्वास्थय, शिक्षा और स्त्री किसी भी विकसित राष्ट्र के मापक हैं जिनकी स्थिति देखकर उस देश की विवेचना सही रूप में की जा सकती है।
भारत और स्वास्थ्य की आज़ादी
कभी कभी बुरा दौर हमें उन सच्चाइयों से अवगत करा जाता है जिसे अच्छा वक़्त किसी परदे की तरह ढँक देता है। कोरोना की महामारी के चलते भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था का दिवालियापन खुल कर सामने आया और डॉक्टर भगवान् का रूप होते हैं ,इस मिथक से भी पर्दा उठा। नामी गिरामी अस्पतालों ने मनमाने ढँग से लोगों से पैसे ऐठने शुरू किए और सरकार की कोशिशें और एडवाइजरी एक विकलांग दर्शक की तरह बन कर रह गई जो देख तो सब कुछ सकता है लेकिन कर कुछ नहीं सकता। इससे पहले भी चमकी रोग से कई बच्चों के मरने की वारदात आई। उससे भी पहले वेंटीलेटर की कमी के कारण कई बच्चे मौत की गोद में सो गए। कितनी स्त्रियाँ आज भी प्रसव पीड़ा से मर जाती है। लाखों बच्चियाँ 3 साल से ज्यादा जी नहीं पाती। वृद्धों को भी दवाओं के लिए लाइन में खड़ा रहना पड़ता है कर स्वास्थ्य कर्मचारियों की झिड़की सुननी पड़ती है। इतने सालों में देश में अनगिनत नदियाँ होने के वावजूद सबको साफ़ पानी नहीं मिलता या पानी एक बोतल 15 रुपए की मिलती है। दुनिया की सबसे प्रदूषित नगरियों में भारत के कई शहर जैसे कि दिल्ली ,फरीदाबाद ,ग़ाज़ियाबाद में मनुष्य जानवरों की तरह झुग्गी में रहता है ,गंदा पानी पीता  है , जहरीली धुआँ साँस लेता है , प्रदूषित भोजन खाता है और बिषैली और सड़ांध ज़मीन के ऊपर सोता है। मिड दे मिल में कई बार बच्चों के खाने में छिपकली तो कभी तिलचट्टे पाए जाते हैं। आप जिस राजधानी में सफर कर के अपने स्टेटस के बखान करते हैं उनके कम्बल महीनों में धुलते हैं। राशन में जो आपको अनाज मिलता हैं उसे तीसरे देशों में गरीबों के बीच बाँटा जाता है। दसियों से हज़ारों मेडिको -लीगल केस चलते रहते हैं लेकिन किसी भी डॉक्टर का लाइसेंस रद्द नहीं होता बल्कि आज से आपके इलाज ना करने की धमकी दी जाती है। सरकारी स्वास्थ्य संस्थाओं की चरमराती व्यवस्था की कहानियाँ अब मज़ाक की बातें हो गई है। मेडिकल इंश्योरेंस से केवल इंश्योरेंस कंपनियों को फायदा होता है। हमारे देश में स्वास्थ्य सेवाएँ अत्यधिक महँगी हैं जो गरीबों की पहुँच से काफी दूर हो गई हैं। स्वास्थ्य, शिक्षा, भोजन व आवास जीवन की मूलभूत आवश्यकताएँ हैं। गौरतलब है कि हमारे संविधान में इस बात का प्रावधान होते हुए भी कि नागरिकों को स्वास्थ्य व शिक्षा प्रदान करना हमारी प्राथमिकता है, हम एक राष्ट्र के रूप में इस लक्ष्य की प्राप्ति में असफल रहे हैं। स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण जारी है जिससे आम लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।भारत संक्रामक रोगों का पसंदीदा स्थल तो है, ही साथ में गैर-संक्रामक रोगों से ग्रस्त लोगों की संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। प्रत्येक वर्ष लगभग 5.8 भारतीय ह्रदय और फेफड़े से संबंधित बीमारियों के कारण काल के गाल में समा जाते हैं। प्रत्येक चार में से एक भारतीय हृदय संबंधी रोगों के कारण 70 वर्ष की आयु तक पहुँचने से पहले ही मर जाता है।स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता में विषमता का मुद्दा भी काफी गंभीर है। शहरी क्षेत्रों के मुकाबले ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति ज़्यादा बदतर है। इसके अलावा बड़े निजी अस्पतालों के मुकाबले सरकारी अस्पतालों में सुविधाओं का घनघोर अभाव है। उन राज्यों में भी जहाँ समग्र औसत में सुधार देखा गया है, उनके अनेक जनजातीय बहुल क्षेत्रों में स्थिति नाजुक बनी हुई है। निजी अस्पतालों की वज़ह से बड़े शहरों में स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता संतोषजनक है, लेकिन चिंताजनक पहलू यह है कि इस तक केवल संपन्न तबके की पहुँच है।तीव्र और अनियोजित शहरीकरण के कारण शहरी निर्धन आबादी और विशेषकर झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। आबादी का यह हिस्सा सरकारी और निजी अस्पतालों के समीप रहने के बावजूद स्वास्थ्य सुविधाओं को पर्याप्त रूप में नहीं प्राप्त कर पाता है। सरकारी घोषणाओं में तो राष्ट्रीय कार्यक्रमों के तहत सभी चिकित्सा सेवाएँ सभी व्यक्ति को निःशुल्क उपलब्ध हैं और इन सेवाओं का विस्तार भी काफी व्यापक है। हालाँकि, ज़मीनी सच्चाई यही है कि सरकारी स्वास्थ्य सुविधा आवश्यकताओं के विभिन्न आयामों को संबोधित करने में विफल रही है।महँगी होती चिकित्सा सुविधाओं के कारण, आम आदमी द्वारा स्वास्थ्य पर किये जाने वाले खर्च में बेतहासा वृद्धि हुई है। एक अध्ययन के आधार पर आकलन किया गया है कि केवल इलाज पर खर्च के कारण ही प्रतिवर्ष करोड़ों की संख्या में लोग निर्धनता का शिकार हो रहे हैं। ऐसा इसलिये हो रहा है क्योंकि कि समाज के जिस तबके को इन सेवाओं की आवश्यकता है, उसके लिये सरकार की ओर से पर्याप्त वित्तीय संरक्षण उपलब्ध नहीं है, और जो कुछ उपलब्ध हैं भी वह इनकी पहुँच से बाहर है।
भारत और शिक्षा की आज़ादी
स्वामी विवेकानंद कहते हैं -" भारत की वर्तमान और भविष्य में आने वाली परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए हमें अपनी वर्तमान शिक्षा प्रणाली में महत्वपूर्ण परिवर्तन करने की अति आवश्यकता है, हमें ऐसी वर्तमान शिक्षा की आवश्यकता है, जो समय के अनुकूल हो, हमारी दुर्दशा का मूल कारण, नकारात्मक शिक्षा प्रणाली है |वर्तमान शिक्षा प्रणाली केवल क्लर्क पैदा करने की मशीनरी मात्र है, यदि केवल यह इसी प्रकार की होती है तो भी मैं ईश्वर को धन्यवाद देता हूँ। इस दूषित शिक्षा प्रणाली के माध्यम से शिक्षित भारतीय युवा पिता, पूर्वजों, इतिहास एवं अपनी संस्कृति से घृणा करना सीखता है, वह अपने पवित्र वेदों, पवित्र गीता को झूठा समझने लगता है, इस प्रकार की शिक्षा प्रणाली के द्वारा तैयार हुए युवा अपने अतीत, अपनी संस्कृति पर गौरव करने के बदले इन सब से घृणा करने लगता है और विदेशियों की नकल करने में ही गौरव की अनुभूति करता है, इस शिक्षा प्रणाली के द्वारा व्यक्ति के व्यक्त्तिव निर्माण में कोई भी सहयोग प्राप्त नहीं हो रहा है |ऐसी शिक्षा का क्या महत्व है, जो हम भारतीय को सदैव परतंत्रता का मार्ग दिखाती है, जो हमारे गौरव, स्वावलंबन एवं आत्म-विश्वास का क्षरण करती है |"
निजी स्कूल-कॉलेजों को तरजीह देने वाले मां-बाप के लिए स्कूली शिक्षा का खर्च उठाना पहले से ही भारी पड़ रहा था, अब तकनीकी व प्रबंधन स्तर की उच्च शिक्षा भी फीस के मामले में बहुत कीमती होती जा रही है। हाल में, आईआईटी की स्थायी समिति ने छात्रों की फीस में 200 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी की सिफारिश की है। उधर, भारतीय प्रबंधन संस्थान-कलकत्ता (आईआईएम-सी) ने भी अपने दो वर्षीय पाठ्यक्रम की फीस करीब 16 प्रतिशत बढ़ा दी है। छात्रों के लिए क्वॉलिटी और आधारभूत ढांचा बनाए रखने के लिए शिक्षण संस्थानों द्वारा फीस बढ़ाने को जायज ठहराने की कोशिश हो सकती है, पर विदेशी शिक्षा के बराबर खर्च पहुंचा देने वाले संस्थान क्या यह गारंटी भी लेने को तैयार हैं कि उनके यहां विदेश स्तर की शिक्षा और डिग्री के बाद ऊंची नौकरी भी मिलेगी? असल में शिक्षा के हर पायदान पर मौजूद तंत्र अब उस मध्य वर्ग के आर्थिक शोषण पर उतर आया है जो अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा-डिग्री दिलाने का प्रयास कर रहा है। देश के उभरते मध्यवर्गीय परिवारों की मानसिकता अब यह है कि परिवार व बच्चों की सेहत और शिक्षा के मामले में कोई समझौता नहीं होना चाहिए। पर मध्यवर्गीय परिवारों की यह कोशिश शिक्षण संस्थानों के बढ़ते लालच के कारण उन्हें कर्ज के गर्त में पहुंचाने लगी है। अफसोस कि हमारी सरकार इस मोर्चे पर खामोश बैठी है और उसने अभिभावकों को शिक्षा के ठेकेदारों के हाथों लुटने के लिए असहाय छोड़ दिया है। स्कूली शिक्षा से लेकर उच्च तकनीकी और प्रबंधन शिक्षण संस्थानों ने फीस बढ़ाने के लिए अपने-अपने तर्क जुटा लिए हैं, जो अभिभावकों के गले भले ही न उतरें लेकिन बच्चों के भविष्य को देखते हुए वे उनके खिलाफ कुछ नहीं कर सकते। इस संबंध में हाल के उदाहरणों पर नजर दौड़ाएं तो पहला मामला आईआईटी का है। आईआईटी की स्थायी समिति ने फीस बढ़ोतरी की जो सिफारिश की है, अगर उसे जस का तस मान लिया जाता है तो फीस 90,000 रुपये से बढ़कर तीन लाख रुपये सालाना हो जाएगी। आईआईटी प्रबंधन का इस संबंध में तर्क है कि जहां तक हो सके, आईआईटी को अपना खर्च खुद निकालना चाहिए। फीस तीन लाख रुपये सालाना हो जाने पर आईआईटी का लगभग 60 प्रतिशत खर्च फीस से ही निकल आएगा। समिति साथ में यह भी कहती है कि आईआईटी छात्रों को फीस के लिए बैंकों से कर्ज और वजीफे की इतनी व्यवस्था हो जाएगी कि आर्थिक वजहों से किसी गरीब छात्र को आईआईटी की पढ़ाई से वंचित नहीं रहना पड़ेगा। हालांकि फीस बढ़ाने का आखिरी फैसला मानव संसाधन विकास मंत्रालय को करना है, पर जो तर्क शिक्षण संस्थानों की तरफ से दिए जा रहे हैं, उनके दबाव में फीस बढ़ोतरी तय लग रही है। शिक्षा के बाजारीकरण का ही असर है कि देश के ज्यादातर शिक्षण संस्थानों का मकसद ज्यादा से ज्यादा धन खींचना हो गया है। इंजीनियरिंग, मेडिकल और प्रबंधन संस्थानों में पहले तो छात्रों को प्रवेश पाने की जद्दोजहद से गुजरना पड़ता है, उसके बाद उनके अभिभावकों की परीक्षा शुरू होती है। अभिभावकों को अपने बच्चों की शिक्षा के लिए मोटी रकम का इंतजाम करना पड़ता है। अगर अभिभावक ऐसा नहीं कर पाते हैं तो छात्रों को इसके लिए प्रेरित किया जाता है कि वे बैंक से शिक्षा के लिए कर्ज लें। बेचारे छात्र समझ ही नहीं पाते हैं कि वे कर्ज लें, आगे पढऩे के लिए या पहले कमाएं। इस बारे में अकसर विदेशों के उदाहरण दिए जाते हैं कि वहां शिक्षा सस्ती नहीं है। शिक्षा की महंगाई की वजह वहां यह है कि वहां मिली डिग्रियां बेहतरीन रोजगार दिलाने और छात्र का वास्तविक मानसिक विकास करने में सहायक होती हैं। क्या स्तर की फिक्र किए बगैर हमारे देश की सरकार को भी शिक्षा महंगी होते हुए देखना चाहिए। वैसे आर्थिक उदारीकरण के इस दौर में कोई भी सरकार आर्थिक नुकसान उठाकर उच्च शिक्षा या तकनीकी शिक्षा को बेहद सस्ता करने का जोखिम नहीं उठाना चाहेगी। इसलिए वह न तो खुद शिक्षा के मामले में एक व्यापारी की तरह काम कर सकती है और न ही आम जनता की कीमत पर निजी क्षेत्र के चंद लोगों को शिक्षा को व्यापार बनाने की छूट दे सकती है। ध्यान रखना होगा कि शिक्षा के मामले में जिस अमेरिका की मिसालें दी जाती हैं, वहां के सरकारी स्कूलों का स्तर निजी स्कूलों जैसा ही होता है। ऐसे में समाज के प्रतिष्ठित और अमीर लोगों के बच्चे भी सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं। बेशक, विकसित देशों के मुकाबले भारत की सामाजिक, आर्थिक परिस्थितियों और खासतौर से देश की बड़ी आबादी को देखते हुए शिक्षा व स्वास्थ्य के विदेशी मॉडल हूबहू यहां लागू करना संभव नहीं है, पर बुनियादी सुविधा माने जाने वाली इन चीजों को पूरी तरह बाजार या निजी हाथों में सौंपना भी उचित नहीं है। इस प्रसंग में यह सवाल अरसे से उठता रहा है कि आखिर आईआईएम या आईआईटी में पढ़ाई का पूरा खर्च आम नागरिक क्यों उठाए? मोटे तौर पर आईआईटी के एक छात्र की पढ़ाई पर सालाना पांच लाख रुपये का खर्च होता है। इसमें फीस, हॉस्टल का खर्च और खाना-पीना सभी शामिल है। मौजूदा व्यवस्था के मुताबिक इस खर्च का सिर्फ 20 प्रतिशत ही छात्रों से बतौर फीस लिया जाता है। शेष 80 प्रतिशत की भरपाई सरकार करती है। इस नजरिये से फीस में बढ़ोतरी जायज मानी जा सकती है। चूंकि आईआईएम और आईआईटी के छात्रों को बेहतर नौकरियां अमूमन मिल ही जाती हैं, इसलिए यह सलाह दी जाती है कि इसके लिए अगर बैंक से कर्ज लेना पड़े तो कोई हर्ज नहीं है। ऐसे में यह बात सही लगती है कि ऐसी उच्च शिक्षा का खर्च सरकार क्यों उठाए, जिसमें अच्छे करियर और आमदनी की गारंटी हो।  इससे तो बेहतर है कि सरकार अपने साधन बुनियादी स्तर की शिक्षा के ढांचे को मजबूत बनाने में लगाए। लेकिन जिस सवाल पर सरकार और शिक्षा शास्त्रियों को विचार करना चाहिए, वह यह है कि अगर कोई छात्र शिक्षा के लिए इतना खर्च करेगा या कर्ज लेगा, तो उसकी यह मजबूरी होगी कि वह ऊंची कमाई वाले रोजगार को ही चुने। भारत जैसे देश में, जहां उसके प्रतिभावान व उच्च शिक्षित नौजवानों के अपने देश के गरीब व वंचित तबकों के लिए काम करने की जरूरत है, वहां शिक्षा का ऐसा व्यवसायीकरण किसी भी किस्म के आदर्शवाद को खत्म कर देगा। जो छात्र इंजीनियर या डॉक्टर बनने के लिए 40-50 लाख रुपये खर्च करेगा, उससे यह उम्मीद करना बेकार है कि वह बांधों और पुलों के निर्माण में ईमानदारी से काम करेगा या डॉक्टर बनने वाला युवा कम खर्च में गरीबों का इलाज करेगा।सरकार को चाहिए कि आईआईटी या आईआईएम जैसे शिक्षण संस्थानों की फीस बढ़ोतरी के लिए बीच का रास्ता निकाले। जो अभिभावक बच्चों को विदेश भेजकर उच्च शिक्षा दिलवा सकते हैं, उनसे बढ़ी हुई फीस ली जा सकती है, पर इसे बाध्यकारी न बनाया जाए। यह भी ध्यान में रखें कि बुनियादी शिक्षा सरकार की प्राथमिकता में होने के बावजूद भारत उन देशों में है जो अपनी जीडीपी का न्यूनतम हिस्सा शिक्षा पर खर्च करता है। कई विकासशील देशों में भी भारत का नंबर बहुत नीचे यानी 143वां है। अगर भविष्य की ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था में हमें आगे बढऩा है, तो शिक्षा पर खर्च बढ़ाना होगा। जबकि सच यह है कि शिक्षा में सरकार की भागीदारी लगातार घटी है। साथ ही उसे यह पहल भी करनी होगी कि शिक्षा के बाजारीकरण पर रोक लगाते हुए इन शिक्षण संस्थानों में प्रवेश की प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी बनाए।
भारत और स्त्री की आज़ादी
शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम् ।
न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा ।। मनुस्मृति ३/५७ ।।
जिस कुल में स्त्रियाँ कष्ट भोगती हैं ,वह कुल शीघ्र ही नष्ट हो जाता है और जहाँ स्त्रियाँ प्रसन्न रहती है वह कुल सदैव फलता फूलता और समृद्ध रहता है । (परिवार की पुत्रियों, बधुओं, नवविवाहिताओं आदि जैसे निकट संबंधिनियों को ‘जामि’ कहा गया है ।)
दिन-प्रतिदिन महिलाओं तथा लड़कियों के साथ दुष्कर्म एवं हत्या के बढ़ते अपराधों ने निश्चिंत रुप से भारतीय समाज में एक उथल-पुथल मचा दी है। दिल्ली, उ.प्र, राजस्थान, एम.पी., मेघालय अथवा महाराष्ट्र इत्यादि कही भी, किसी भी राज्य में क्यों न हो, यह अत्याचार निंदनीय है। चूँकि कानून और व्यवस्था का मसला राज्यों का है तो जबाबदेही भी राज्य सरकारों की ही बनती है, अतः जनमानस की एवं हमारे मीडिया की सोच भी सही ही है। दूसरी बात है कि इन घटनाओं में किसी महिला के दलित या सवर्ण होने से अपराध की गंभीरता किसी भी कीमत पर कम नहीं हो सकती है, हमारे समाज में स्त्री के दलित या सवर्ण होने की यह सोच कही समाज में एक ऐसी दूरी न पैदा कर दे कि स्त्री ही स्त्री को कम या अधिक आँकने की ओर मुडने को बाध्य हो जाए। स्वातंत्र्योत्तर भारतीय समाज में महिलाओं को अपने अधिकार पाने के लिए आज भी संघर्ष करना पड़ रहा है, इसे याद रखना भी अत्यंत आवश्यक है।15 वर्षों में, भारत की जेलों में महिला कैदियों में 61 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है। हिरासत में यातना, बलात्कार, स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित, स्वच्छ भोजन और पानी की कमी और राज्य की ओर से आईएएस सबके प्रति सरासर अज्ञानता, भारतीय जेल के कैदियों के अधिकारों का सम्मान करने में विफल रही है। भारतीय जेलों के भीतर किए गए विभिन्न अध्ययनों से हमेशा यह निष्कर्ष निकला है कि अधिकांश कैदी आदिवासी, दलित या अन्य हाशिये के समुदायों में से हैं जिनका अपराधीकरण किया जा रहा है। उनका सामाजिक और आर्थिक पिछड़ापन उन्हें कमजोर बनाता है, जो कानूनी और आर्थिक रूप से खुद का बचाव करने में असमर्थ हैं। सुनवाई में कई कार्यकर्ताओं को सुना गया, जिन्हें कई मामलों में झूठे आरोपों में फंसाया गया था, जेलों में उनके अनुभवों की उनकी भावनात्मक प्रशंसा और भारतीय राज्य की राजनीतिक उदासीनता को दूर करने के लिए उन्होंने जो उपाय सुझाए, उन्हें भी साझा किया गया।पूरी दुनिया में भारत महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक और असुरक्षित देश माना गया है। थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन की ओर से जारी किए गए एक सर्वे में महिलाओं के प्रति यौन हिंसा, मानव तस्करी और यौन व्यापार में ढकेले जाने के आधार पर भारत को महिलाओं के लिए खतरनाक बताया गया है। इस सर्वे के अनुसार महिलाओं के मुद्दे पर युद्धग्रस्त अफगानिस्तान और सीरिया क्रमश: दूसरे और तीसरे, सोमालिया चौथे और सउदी अरब पांचवें स्थान पर हैं। 550 विशेषज्ञों के द्वारा किए गए इस सर्वे में महिलाओं के प्रति यौन हिंसा के खतरों के लिहाज से एकमात्र पश्चिमी देश अमेरिका है. इस सर्वे में 193 देशों को शामिल किया गया था, जिनमें से महिलाओं के लिए बदतर शीर्ष 10 देशों का चयन किया गया। इस सर्वे को 26 मार्च से 4 मई के बीच ऑनलाइन, टेलीफ़ोन के माध्यम के साथ लोगों3 से मिलकर बातचीत कर पूरा कराया गया. इसमें यूरोप, अफ्रीका, अमेरिका, दक्षिण-पूर्व  एशिया के पेशेवर, शिक्षाविद, स्वास्थ्य देखभाल कर्मचारी, गैर सरकारी संगठन के लोग, नीति निर्माता, विकास विशेषज्ञ और सामाजिक टिप्पणीकार शामिल थे। 2011 में हुए इस सर्वे में अफगानिस्तान, कॉन्गो, पाकिस्तान, भारत और सोमालिया महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक देश माने गए थे।वहीं, इस साल भारत तीन पायदान ऊपर खिसक पहले स्थान पर आ गया है इससे यह साबित होता है कि 2011 में दिल्ली में एक चलती बस में हुए सामूहिक बलात्कार के बाद अभी तक महिलाओं की सुरक्षा को लेकर पर्याप्त काम नहीं किए गए हैं। साल 2011 में हुए निर्भया कांड के बाद महिलाओं की सुरक्षा और उनके ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा देश के लोगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया था। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 2007 से 2016 के बीच महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध में 83 फीसदी का इजाफा हुआ है. साथ ही हर घंटे में 4 रेप के मामले दर्ज किए जाते है।सर्वे के मुताबिक, भारत मानव तस्करी, यौन हिंसा, सांस्कृतिक व धार्मिक परंपराओं के कारण और महिलाओं को सेक्स धंधों में ढकेलने के लिहाज से अव्वल है. रॉयटर्स के मुताबिक, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने इस सर्वे के परिणामों पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया। सर्वेक्षण में उत्तरदाताओं से पूछा गया कि 193 संयुक्त राष्ट्र के सदस्य राज्यों में से महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक पांच देश कौन से हैं और स्वास्थ्य, आर्थिक संसाधन, सांस्कृतिक  और पारंपरिक प्रथाओं, यौन हिंसा, उत्पीड़न, गैर-यौन हिंसा और मानव तस्करी के मामले में कौन सा देश सबसे खराब है। उत्तरदाताओं ने भारत को मानव तस्करी, यौन उत्पीड़न और सेक्स स्लेवरी, घरेलू ग़ुलामी और ज़बरदस्ती विवाह कराने और भ्रूण हत्या कराने के आधार पर भी महिलाओं के लिए सबसे ख़तरनाक देश बताया है।
जिस देश में महिलाओं को देवी का स्थान प्राप्त है ,वहाँ इस तरह की संस्कृति यह बतलाती है कि कितनी और कैसी आज़ादी अभी भी अपेक्षित है।
 
समिति अधिकारी लोक सभा सचिवालय
संसद भवन, नई दिल्ली