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बच्चों को मिलेंगी और अच्छी क्वालिटी की किताबें (शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र के वर्ष 12, अंक संख्या-23, 04 जनवरी 2016 में प्रकाशित लेख का पुनः प्रकाशन)
July 27, 2020 • Havlesh Kumar Patel • OLD


शि.वा.ब्यूरो, लखनऊ। बिहार और महाराष्ट्र की तर्ज पर अब उत्तर प्रदेश के परिषदीय एवं सहायता प्राप्त विद्यालयों में कक्षा एक से आठ तक बच्चों को दी जाने वाली किताबें भी ए-ग्रेड कागज पर छापी जाएंगी। इसके लिए वर्जिन पल्प से निर्मित कागज का प्रयोग किए जाएगा, जिससे किताबों की क्वालिटी काफी अच्छी होगी और चमकदार भी होंगी। इसके लिए बेसिक शिक्षा विभाग की ओर से शासन को प्रस्ताव भेज दिया गया है। जल्द ही इस पर निर्णय लेने की उम्मीद है।
ज्ञात हो कि सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत परिषदीय प्राथमिक, उच्च प्राथमिक के साथ-साथ राजकीय, सहायता प्राप्त तथा मदरसों में कक्षा आठ तक के बच्चों को निशुल्क पाठ्य पुस्तकें दिए जाने का प्रावधान है। मौजूदा समय में प्रदेश में करीब एक करोड़ 93 लाख बच्चों के लिए करीब 10 करोड़ किताबें छपवाई जानी है। अभी जो निशुल्क किताबें उपलब्ध कराई जा रही हैं, वह फाइबर मैक्स युक्त क्रिम लेड, क्रिमवोब पेपर पर छापी जाती हैं। जो कि 70 जीएसएम की होती हैं। यह पेपर भी इकोफ्रेंडली रिसाइकिल होता है। ऐसे में किताबों के अंदर के पन्ने अधिक चमकदार नहीं होते। जिससे किताबों की क्वालिटी भी बहुत अधिक अच्छी नहीं होती। पिछले काफी समय से इन किताबों की क्वालिटी बेहतर किए जाने पर काम भी चल रहा है। इसी क्रम में इस बार वर्जिन पल्प से निर्मित पेपर पर किताबें छापने की तैयारी शुरू की गई है।
वर्ष 2014-15 में बिहार और महाराष्ट्र में वर्जिन पल्प से निर्मित पेपर पर किताबें छापी गई थीं, जबकि कर्नाटक में वर्ष 2015-16 में वर्जिन पल्प से निर्मित मैपलिथो ए-ग्रेड पेपर पर किताबें छापकर दी गई थीं। अब इसी तर्ज पर उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों में बच्चों को निशुल्क दी जाने वाली किताबें भी ए-ग्रेड कागज पर छापने की तैयारी है। 
परिषदीय एवं सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों को इस बार भी समय से किताबें नहीं मिल सकेंगी। इसकी वजह है कि अब तक किताबें छापने की नीति का जारी न होना है। बेसिक शिक्षा विभाग की ओर से किताबें छापने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए अक्टूबर में शासन को प्रस्ताव भेजा गया था, लेकिन इस पर कोई आदेश नहीं हुआ। अब फिर से प्रस्ताव भेज दिया गया है। किताबों की निविदाएं आमंत्रित करने से लेकर उसे छपाने एवं स्कूल तक पहुंचाने में चार महीने से अधिक का समय लगता है, जबकि नया शैक्षिक सत्र एक अप्रैल से शुरू होना है।