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भाद्रपद को कहा जाता है डायनों का महीना, करसोग के बलिण्डी के समीप मानी जाती है काण्डा डायनों की क्रीड़ास्थली, किए जाते हैं अनुष्ठान
September 4, 2020 • Havlesh Kumar Patel • Himachal
डा हिमेंद्र बाली 'हिम', शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।
 
हिमालयी क्षेत्र में भाद्रपद महीना काला महीना माना जाता है। इस महीने  कोई धार्मिक अनुष्ठान मंदिर में नहीं होता है। भाद्रपद महीने को काला महीना माना जाता है। वैसे पौष महीना भी काला महीना माना जाता है। तब देवता स्वर्ग या इन्द्रपुरी जाते हैं। भाद्रपद महीने में ऐसा भी विश्वास किया जाता है कि देवगण निद्रावस्था में रहते हैं। सतलुज घाटी के सांगरी व कुमारसैन क्षेत्र में यह मान्यता भी है कि देवता के निद्रावस्था में या मंदिर से चले जाने से अधीनस्थ देवों को क्षेत्र की रक्षा का दायित्व सौंपा जाता है।
इस पूरे महीने मंदिर में सांयकाल वाद्ययंत्रों पर आसुरी शक्तियों को भगाने के लिए बेड़ दी जाती है। कुमारसैन के चेकुल गांव में प्रतिष्ठित भगवती ज्वाला के मंदिर में सांय 'सदीऊए' अर्थात् घी के दीए हर देवी देवता के मंदिर में जलाए जाते हैं। यहां इस महीने धूप के स्थान पर धूड़च में आग डालकर घी का धूप अर्पित किया जाता है। चेकुल की भगवती के गण लांकड़ा का गूर रात्रि में देवारेाहण में आता है और अपने क्षेत्र का दौरा कर दुरात्माओं से रक्षण करता है। गूर हर घर में अपनी शांगल अर्थात् लौह आयुध से प्रहार कर अनिष्ट शक्तियों से रक्षा करता है। ऐसे ही गांव भडैवग के मरेच्छ देवता के गण दूत भी रात्रि में आवेश में आकर अपने क्षेत्र की रक्षा के दायित्व का निर्वहन करता है।
भाद्रपद महीने में कुमारसैन में घर के उतरी कौने में पथ्थर की स्लेटों का आला चीड़ा में सांय अग्नि प्रज्जवलित कर घर से भूत-प्रेत भगाने के पहाड़ी पद गाए जाते हैं। घर से पिस्सू,खटमल व कीड़े-मकोड़े भगाने के गीत गाये जाते हैं। गीतों में अपने चीड़े को अच्छा व दूसरे के चीड़े को बुरा कहा जाता है।
सुकेत क्षेत्र के करसोग में भी भाद्रपद महीने को डायनों का महीना कहा जाता है। यहां ऐसी मान्यता है कि इस महीने तंत्र विद्या के जिज्ञासु तंत्र साधना कर दूसरों को पीड़ा पहुंचाने का कार्य करते हैं। करसोग के बलिण्डी के समीप काण्डा डायनों की क्रीड़ास्थली माना जाता है। यहां लोगों ने तंत्र विद्या की सिद्धहस्त महिलाओं को जीभ का अम्बार लगाकर बैठे देखा है। दूर जट्ट की भारभाषणी में नाग शिरोमणि माहूंनाग को भाद्रपद महीने में काण्डा में डायनों के साथ युद्ध करने जाते उल्लेख किया है-
भदरै महीने काण्डे ले जाओ,
रैत वलैत नागा लै नवाओ.....
अर्थात् भादों महीने में नाग काण्डा डायनों से लड़ने जाते हैं। मण्डी में भाद्रपद महीने की सोलह प्रविष्टे को जोगेन्द्रनगर के समीप घोघरधार में डायन पार्क में चारों दिशाओं से चार जोगनियां आती हैं और देवताओंके साथ तब तक युद्ध करतीं हैं, जब तक निर्णय न हो जाए। यदि देवता विजय हुए तो अच्छी फसल होती है और यदि योगिनियां विजयी हुए तो अकाल की सम्भावना रहती है। सोलह भादों को लोग कम्बोगीर धार (घोघरधार) से अपने मवेशियों को दूर ले जाते हैं, ताकि योगिनियां इनका शिकार न करे।
एक विश्वास ऐसा भी है कि यदि देवता विजयी हुए तो वे लोगों की फसल रौ़द देते हैं और यदि हारते हैं तो वे चुपचाप लौटते हैं और लोगों को याद करते हैं। वे अपने आगमन की सूचना दृष्टांत अथवा स्वप्न द्वारा देते हैं। डायनों की पराजय की स्थिति में लोगो़ं को हानि पहुंचाती हैं। विजय प्राप्त करने की स्थिति में लोगों को कोई हानि नहीं पहुंचाती हैं। इस दिन डायनों के प्रस्थान के समय कांगड़ी क्षेत्र में गांवों के लोग हाथों में डंडे लेकर घरों से बाहर मार्गों पर पत्थरों पर उन्हें पीटते हुए जोर-जोर से चिल्लाते हैं-डैड़ी रण्डो! बत्तें औहन्यों! बत्तें जाहन्यों!
अर्थात् डायनों! मार्ग से जाओ, मार्ग से जाओ.....ऐसा कहने के बाद भेखल की झाड़ी की डालियां घरों  के दरवाजों पर लगाई जाती हैं। किन्नौर में भेखल को ब्रेकलिंग कहा जाता है। यहां भी भेखल स दुरात्माओं को घर से भगाया जाता है। भाद्रपद कृष्ण चतुर्दशी को डैण चौहदें तथा डग्वांस कहा जाता है। कई स्थानों पर अमावस्य को भी यह अनुष्ठान किया जाता है, इसलिए इस अनुष्ठान को डायनों की अमावस्य डग्वास कहा जाता है। इन दोनों दिनों में भेखल, कंटीली झाड़ी टिम्बर की डालियों को घरों के दरवाजों पर लगाया जाता है,.घरों में अभिमंत्रित सफेद सरसों को बिखेरा जाता है। सतलुजघाटी के बड़ागांव सांगरी में डगैड़ी के दिन भेखल के साथ तुम्बा अर्थात् घीया को बलि स्वरूप छत पर लटकाया जाता है। कुमारसैन में भी खीरा को डायनों के निमित दरवाजे पर सांयकाल बलि रुप में काटा जाता है।
इस प्रकार भादों महीने में अनिष्टकारी शक्तियों के निवारण के लिए हिमालयी क्षेत्र में अनुष्ठान किए जाते हैं। इससे यह अनुमान लगाना सहज है कि इस पर्वतीय क्षेत्र में आसुरी शक्तियों का भय प्राचीन काल से रहा है। यहां की कथा-कहानियो में राक्षसों, यक्षिणियों व भूतों के प्रसंग आज भी प्रचलित हैं। बहरहाल भादों का काला महीना आसुरी शक्तियों से आनुष्ठानिक परम्पराओं का महीना हैं।
अध्यक्ष सुकेत संस्कृति एवम् जनकल्याण मंच कुमारसैन