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हिमाचल प्रदेश के पांगणा में नाग पंचमी भी ऋषि पंचमी के दिन ही मनाई जाती है
August 22, 2020 • Havlesh Kumar Patel • Himachal
डॉ जगदीश शर्मा, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।
 
देश-विदेश में सुकेत की ऐतिहासिक प्राचीन नगरी के नाम से मशहूर पांगणा की प्राचीन संस्कृति आधुनिक युग के लिए प्रेरणा स्त्रोत है। रविवार को पांगणा में ऋषि पंचमी व नाग पंचमी का त्योहार धूमधाम से मनाया गया। शिव के प्रिय होने के कारण नागों के पूजन से भगवान भोलेनाथ को श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना कर  प्रसन्न किया गया। जिससे परिवार में दरिद्रता, कलह दूर होकर घर में ही स्वर्ग सा सुख प्राप्त किया जा सके। इस पर्व पर प्रातः काल ही परिवार के सभी सदस्यों ने नाग पूजा का संकल्प लेकर स्नानादि से निवृत होकर पूजा की तैय्यारी शुरू कर दी ।परिवार की एक महिला ने पूजा कक्ष में ओर दरवाजों की देहरी,आँगन के मध्य बने "माँदले"(वर्गाकार पूज्य पत्थर) पर "घणोटी"( लाल मिट्टी से वर्गाकार आकार का छोटा मंडल बनाकर) इस पर "पठावे" (देवदार के परागकणो)से नाग की आकृतियां बनाकर चंदन टीका, दुर्वा, चावल के दानों, पुष्प, धूप, दीप से पूजन किया। फिर पूजा कक्ष में धान,कुरही,कोठा,कचालु,माश के पौधों,चांदी से बनी नाग-नागिन की लघु प्रेतिमाओ की स्थापना की।
परिवार के सभी सदस्यों ने बारी-बारी से विघ्नहर्ता श्री गणेश जी, दूध से बनाई नाग-गाय आदि की आकृतियाँ तथा चाँदी से बनी नाग-नागिन के श्री विग्रह का जल,चंदन,अक्षत,दूर्वा,पुष्प,फल,धनराशि,धूप-दीप से "नाग राजाय नमः" "ॐ नमों शिवाय" के मंत्रों  के उच्चारणो के साथ पूजन कर नतमस्तक होकर प्रार्थना के साथ नाग देवता और शिव भगवान जी को प्रसन्न कर आशीर्वाद प्राप्त किया।काल सर्प योग वाले व्यक्तियों ने घर में पूजा करने के बाद सुकेत अधिष्ठातात्री राज-राजेश्वर महामाया  पांगणा के परिसर में  स्थित एकमात्र नाग देवता माहुंनाग जी के ऐतिहासिक देओरे में जाकर सुगंधित दूध और सुगंधित पुष्पों से पूजा-अर्चना कर "ॐ कुरुकुल्ये हुं फट स्वाह" मंत्रोच्चारण कर स्वयं को काल सर्प योग, सर्पशाप, सर्पदोषो, घर-व्यापारिक संस्थानों, गौशाला, बाग-बागीचे से नाग मुक्ति की कामना कर स्वयं को धन्य किया। पूजा के बाद सभी ने वरिष्ठ सदस्यों के चरण स्पर्श कर शुभ आशीर्वाद प्राप्त किया तथा विविध पकवानों का सेवन किया।सुकेत संस्कृति साहित्य  एवं जन कल्याण मंच पांगणा के अध्यक्ष डाक्टर हिमेन्द्र बाली का कहना है कि नाग देवता तथा प्रकृति के विभिन्न रूपों की पूजा से जुड़ी नाग पंचमी और ऋषि पंचमी से अनेक किंवदंतियां और पौराणिक  कथाएँ जुड़ी हैं। व्यापार मंडल पांगणा के सचिव सुमित गुप्ता और युवा प्रेरक पुनीत गुप्ता का कहना है कि धीरे-धीरे ऋषि पंचमी और नाग पंचमी का यह पर्व घर में स्थित पूजा कक्ष तक ही सिमटता जा रहा है। नई पीढ़ी के बहुत कम लोगों को जानकारी है कि नाग पंचमी के दिन राजा श्यामसेन द्वारा स्थापित माहुंनाग मंदिर में  नाग देवता जी की पूजा-अर्चना कर जन्म कुंडली के काल सर्प योग से मुक्ति मिल सकती है। संस्कृति मर्मज्ञ डॉक्टर जगदीश शर्मा का कहना है कि जिन महिलाओं का रजोधर्म प्राकृतिक रूप से पूर्ण हो जाता है। वे महिलाएं बावड़ी या जलाशय में स्नान कर अरुन्धती सहित सप्तऋषियों में का उद्यापन (छीदर) कर रात को आकाश में सप्तऋषियों के रुप में सात तारों के समूह का दर्शन-पूजन-अर्चन कर ब्राह्मणो को दान दक्षिणा व भोजन करवाने के बाद स्वयं भोजन कर व्रत तोड़ती हैं। पांगणा क्षेत्र में ऋषि पंचमी को नाग पंचमी के रुप में ही मनाया जाता है।
श्रावण शुक्ल पक्ष की नाग पंचमी मनाने की पांगणा क्षेत्र में  परंपरा नहीं है। इनका कहना है कि पांगणा के इस माहुंनाग के देओरे मे सांप के द्वारा काटे गये व्यक्ति का विष तीन दिनों में नाग कृपा से स्वत: ही उतर जाता है। सांप द्वारा काटे व्यक्ति को इस देव स्थल मे लाने के बाद तीन दिन तक न सोने देते हैं और न हो तो खाने के लिए भोजन-पानी या फल देते है। सांप द्वारा काटे इस व्यक्ति  को  केवल दूध का ही सेवन करवाया जाता है। तीन दिन बाद नाग देवता की कृपा से विष मुक्त होने के बाद व्यक्ति और परिवार के मन को असीम शांति मिलती है। मान्यता है कि जो भक्त श्रद्धा भाव से नाग पंचमी का व्रत कर माहुंनाग के देओरे में नाग देवता की पूजा करता है, उसकी मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होती हैं। माहुंनाग जी के इस प्राचीन देओरे(मंदिर) में न ही तो कोई प्रतिमा है और न ही तो कोई दानपात्र है। सिर्फ देओरे के मध्य में  स्थित कलात्मक काष्ठ स्तंभ पर नाग देवता की आकृति और बेल बूटे बने हैं।श्रद्धालु इसी स्तंभ की पूजा-अर्चना करते हैं।
पांगणा करसोग (मण्डी) हिमाचल प्रदेश