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इजरायल से सीख ले भारत
September 23, 2020 • Havlesh Kumar Patel • National

सुनील वर्मा, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

 
भारत की दो ऐसी सैनिक घटनाएँ है, जो हमारे देश के दिल में सदा रहनी चाहिए और उनसे सीख भी जरूर लेनी चाहिए। पहली तीन साल पहले घटी थी, जब सोते हुए सैनिकों पर अटेक हुआ था और दूसरी अभी हाल ही मेँ हुई, जिसमें एलएसी पर चीन के सैनिको द्वारा भारतीय सैनिको पर धोखे से हमला किया था, जिसमे भारत के 20 सैनिक मारे गये थे। 
इस तरह से धोखे से मारना कौन से युद्ध का हिस्सा है, यह मेरी समझ से परे है। अगर ये हीे छद्म युद्ध कहलाता है तो सोते हुए धोखे से परमाणु बम भी चलाया जा सकता है, असल चिंता इसी बात को लेकर है। आज अपने आप को परमाणु पाँवर कहने वाला ऐसा कोई देश नही है, जिसके पास पाँच सौ कि.मी. तक हमला करने वाली परमाणु सामग्री से लेस मिसाईल न हो और जिनको दिन के उजाले में नही, बल्कि रात के अंधेरे में भी छोडा जा सकता है। क्या ये सोचने की विषय वस्तु नही है? सच कहूँ तो अगर आप इजराइल के दुश्मन हो और आप मुस्लिम हो, तो आपका इस दुनिया में कही भी जिन्दा रह पाना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है। 
दोस्तों! इजरायल का ये रुतबा यूं ही नहीं बना है। जब हिटलर से जान बचाकर यहूदी इजराइल पहुचे थे और इजराइल बसाया था, तभी अरब के मुस्लिमों ने पहली बार इजराइल पर 1948 में हमला किया था। उस समय बस इजराइल बना ही था, उसके पास कोई बड़ी सेना, गोला बारूद या धन आदि नहीं था, परंतु फिर भी इजराइल ने अरब को 1949 में बड़े आसानी से हरा दिया था। तब से लेकर अब तक अरब देशों ने 6 बार इजराइल से युद्ध लड़े हैं और इजराइल ने हर बार मुस्लिम देशों को हराया है। अगर आंकड़ों की बात करें तो 1948 से अब तक अरब-इजराइल युद्धों में इजराइल के लगभग 21000 सैनिक शहीद हुए हैं, वहीं मुस्लिम देशों के 92000 से अधिक।         
       ISIS पूरे अरब में आतंक मचाये हुए थे। हजारों लोगों का कत्लेआम इन्होने किया है, पर अब तक इजराइल पर एक भी गोली भी नहीं चलाई है। इजराइल सीरिया का पडोसी ही देश है, फिर भी एक भी इजराइल के नागरिक को छुआ तक नहीं, क्योंकि उनको पता है, जहां इजराइल को थोडा भी छेड़ा तो इजराइल की ओर से मिसाइल दाग दिया जायेगा या इजरायल चढ़ाई कर देगा।
ध्यान किजिए! म्युनिक ओलिंपिक में जिहादी तत्वों ने इजराइल के खिलाडियों की जर्मनी में हत्या कर दी थी और वो जिहादी एक मुस्लिम देश में ही जाकर छुप गये थे, जिनकी संख्या सैंकड़ो में थी। इजराइल की मोसाद के 30 जवान उस मुस्लिम देश में घुसकर उन जिहादियों को मार आये थे और उसमें इजराइल का सिर्फ एक ही जवान शहीद हुआ था।
    दरअसल भारत पर आजतक धोखे से हुए हमलो के लिए पाकिस्तान के नेताओ में इतना दिमाग नही है, जो इस तरह की युद्ध लड़ सके। पाकिस्तान का दिमाग चीन है, जिसके पास पाकिस्तान ने आज अपने आप को पूरी तरह से गिरवी रख रखा है। पाकिस्तान की कोई भी गतिविधियाँ हो, उग्रवाद से लेकर कश्मीर तक, बिहाईंड दा स्क्रीन इसकी सारी  स्क्रिप्ट चीन लिंखता है। अगर ऐसा नही होता तो क्या पाकिस्तान अपने देश में होने वाले विस्फोटो को नही रोक पाता? उसके हाथ में कुछ नही है, वो इस समय बिलकुल खाली है। उसमे दिमाग चीन का है और दिल उग्रवादियों का। बेशक़ आप उस पर अटैक कीजिए, परन्तु उसकी लड़ाई की दिशा और दशा दोनो ही चीन तय करेगा। इसको अपने दिमाग मे रखकर राजनाथ सिंह के बुढ़ापे मे मरने की चिंता को दरकिनार करते हुए डौभाल की स्तुति को भी कुछ समय के लिए खुड्डा लाइन किजिए और हमला करने से पहले दो चीजों को जहऩ में रख कर आगे बढिये। पहला पाकिस्तान की तरह चीन का मोस्ट फेवरड नेशन को खत्म किजिए। दूसरा अमेरिका पाकिस्तान की तरफ से परमाणु सामग्री का प्रयोग होने देगा या नही, इसे कंन्फर्म किजिए, क्योकि चीन पाकिस्तान का पेट नही भरता, सिर्फ हथियारो की आपूर्ति करता है। उनको कहाँ और कैसे इस्तेमाल करना है, उसकी टाईम लाइन तय करता हैं चीन, जो कभी पाकिस्तान को स्थिर नही होने देगा और भारत को मजबूत। अमेरिका आज तक पाकिस्तान का पेट भरता रहा है, इसलिए अगर अमेरिका आपको आश्वस्त करता कि किसी भी परिस्थिति में पाकिस्तान परमाणु शस्त्रों का प्रयोग नही करेगा तो आपकी जीत निश्चित होगी।
    अब इन दोनो काम मे से एक काम आप खुद कर सकते है, जो आपके हाथ में है और दूसरा जो अमेरिका के हाथ में है, क्योंकि आज आप अमेरिका के साथ दोस्ती का दम्म भी भरते है। इसी दोस्ती की खातिर उसकी जान से भी ज्यादा प्यारे डालर को 57 रुपये से 72 रुपये तक पहुँचाने का काम भी आपने ही किया है, जो चीन का भी चिंता का कारण बना हुआ है। कम से कम आप अमेरिका से इतने बडे काम के लिये अपनी दोस्ती के चलते इतना तो आश्वासन ले ही सकते है कि किसी भी परिस्थितियो में पाकिस्तान चीन के कहने से परमाणु सामग्री का प्रयोग नही करेगा और अगर इतना भी नही कर सकते तो पहले अपने देश मैं बैठे बुरखा दत्त जैसे पत्रकारो को दो गोली मारिए, जो आतंकवादियों को मासूम नौजवान कहते है। पेलेट की बंदूक से दो दो गोलियों का स्वाद भारत के इन लाल झंडे वाले, जो आज भी इस देश में चीन की रहनुमायी करते है, और एके 47 की नाल कुछ गद्दार नेताओं को भी दिखाईये, जो आतंकवादियों के लिए मानवाधिकार की बात करते है। उसी पेलेट गन के मुँह का स्वाद दाऊद जैसे हरामियों से पैसा लेकर आतंकवाद समर्थित फिल्मे बनाने वालों को भी चखाईए। उसी पेलेट गन से 2 गोलियां सीधे उन वकीलों को भी मारिए, जो आतंकियों के लिए निशुल्क केस लड़ते है। इनके इलाज बगैर सीमा पर जवान भेजना व्यर्थ है। नही तो बस निंदा, सुपर निंदा, अति निंदा, जबरदस्त निंदा, भयानक निंदा जैसे अपने परम्परागत हथियारों को उपयोग करते रहिए, क्योंकि अगर आप अभी भी नींद में है तो सिर्फ़ ये ही हथियार चल सकते है। 
 
लेखक वरिष्ठ पत्रकार है