ALL social education poem OLD miscellaneous Muzaffarnagar UP National interview Himachal
कथा-सम्राट प्रेमचंद के जन्म दिवस 31 जुलाई पर विशेष
July 31, 2020 • Havlesh Kumar Patel • miscellaneous

प्रदीप कुमार सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

जो आदमी दूसरी कौम से जितनी नफरत करता है, 
समझ लीजिये कि वह खुदा से उतनी ही दूर है! - प्रेमचंद
 प्रेमचंद जी का जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी केनिकट लमही गाँव में हुआ था। उनकी माता का नाम श्रीमती आनन्दी देवी व पिता का नाम मुंशी अजायबराय था। उनके पिता लमही में डाकमुंशी थे। प्रेमचंद 7 साल के थे तभी उन्होंने लालपुर के मदरसा में शिक्षा प्राप्त करना शुरू किया। मदरसा में प्रेमचंद ने मौलवी से उर्दू और फारसी भाषा का ज्ञान प्राप्त किया। अंग्रेजी, दर्शन, फारसी और इतिहास लेकर इंटर पास किया और बी.ए. पास करने के बाद शिक्षा विभाग के इंस्पेक्टर पद पर कुछ समय तक कार्य किया। 
 महान लोग वाकई महान होते है हिन्दी जगत के महान लोकप्रिय लेखक मंुशी प्रेमचंद की मानव जाति सदैव ऋणी रहेगी। उन्हें परवाह थी तो बस अपनी कलम की धार की, न फटे जूतों की न ही गरीबी से तंग हाल की। वह साहित्य को सच्चाई के धरातल पर उतारने वाले तथा आधुनिक हिन्दी कहानी के पितामह और उपन्यास सम्राट थे। इस साहित्य जगत के महान सम्राट के जीवन की शुरूआत गरीबी से नंगे पाँव हुई थी। 
 मुंशी प्रेमचंद आर्य समाज से प्रभावित रहे, जो उस समय का बहुत बड़ा धार्मिक और सामाजिक आंदोलन था। उन्होंने विधवा-विवाह का समर्थन किया और 1906 में दूसरा विवाह अपनी प्रगतिशील परंपरा के अनुरूप बाल-विधवा शिवरानी देवी से किया। उनकी तीन संतानें हुईं- श्रीपत राय, अमृत राय और कमला देवी श्रीवास्तव। प्रेमचन्द की आर्थिक विपत्तियों का अनुमान इस घटना से लगाया जा सकता है कि पैसे के अभाव में उन्हें अपना कोट बेचना पड़ा और पुस्तकें बेचनी पड़ी। एक दिन ऐसी हालत हो गई कि वे अपनी सारी पुस्तकों को लेकर एक बुकसेलर के पास पहुंच गए। वहाँ एक हेडमास्टर मिले जिन्होंने उनको अपने स्कूल में अध्यापक पद पर नियुक्त किया।
 सादा एवं सरल जीवन के मालिक प्रेमचन्द सदा मस्त रहते थे। उनके जीवन में विषमताओं और कटुताओं से वह लगातार खेलते रहे। इस खेल को उन्होंने बाजी मान लिया जिसको हमेशा जीतना चाहते थे। कहा जाता है कि प्रेमचन्द हंसोड़ प्रकृति के मालिक थे। विषमताओं भरे जीवन में हंसोड़ होना एक बहादुर का काम है। इससे इस बात को भी समझा जा सकता है कि वह अपूर्व जीवनी-शक्ति का द्योतक थे। सरलता, सौजन्य और उदारता की वह मूर्ति थे। जहाँ उनके हृदय में मित्रों के लिए उदार भाव था वहीं उनके हृदय में गरीबों एवं पीड़ितों के लिए सहानुभूति का अथाह सागर था। प्रेमचन्द 19वीं तथा 20वीं सदी के युग पुरूष थे।
 प्रेमचन्द की रचना-दृष्टि, विभिन्न साहित्य रूपों में अभिव्यक्त हुई। वह बहुमुखी प्रतिभा संपन्न साहित्यकार थे। प्रेमचंद की रचनाओं में तत्कालीन इतिहास बोलता है। उन्होंने अपनी रचनाओं में जन साधारण की भावनाओं, परिस्थितियों और उनकी समस्याओं का मार्मिक चित्रण किया। उनकी कृतियाँ भारत के सर्वाधिक विशाल और विस्तृत वर्ग की कृतियाँ हैं।
 हिन्दी फिल्म के प्रसिद्ध लेखक एवं निदेशक गुलजार साहब प्रेमचंद के बारे में कहते है कि तीन तीन पुश्तों को बंधुआ मजदूरी में बांध के तुमने कलम उठा ली ‘‘शंकर महतो’’ की नसलें अब तक वो सूद चुकाती है। ‘‘ठाकुर का कुँआ’’ और ठाकुर के कुँए से एक लोटा पानी, एक लोटे पानी के लिये दिल के सोते सूख गये। ‘‘झोंकू’’ के जिस्म में एक बार फिर ‘‘रायदास’’ को मारा तुमनें। मंुशी जी आप विधाता तो न थे, लेखक थे, अपने किरदारांे की किस्मत तो लिख सकते थे...! 
 प्रेमचंद जी कुछ अनमोल वचन इस प्रकार हैं - (1) जो आदमी दूसरी कौम से जितनी नफरत करता है, समझ लीजिये कि वह खुदा से उतनी ही दूर है, (2) विपत्ति से बढ़कर.... अनुभव सीखने वाला कोई विद्यालय आज तक नही खुला, (3) जीवन को सफल बनाने के लिए शिक्षा की जरूरत है, डिग्री की नहीं। हमारी डिग्री है- हमारा सेवा भाव, हमारी नम्रता तथा हमारे जीवन की सरलता, (4) अगर हमारी आत्मा जाग्रत नहीं हुई तो कागज की डिग्री व्यर्थ है, (5) अपनी भूल अपने ही हाथों से सुधर जाए तो यह उससे कहीं अच्छा है कि कोई दूसरा उसे सुधारे, (6) बुराई का मुख्य उपचार मनुष्य का सद्ज्ञान है। इसके बिना कोई उपाय सफल नहीं हो सकता, (7) जीवन का वास्तविक सुख, दूसरों को सुख देने में हैं, उनका सुख लूटने में नहीं तथा (8) मैं एक मजदूर हँू, जिस दिन कुछ लिख न लूँ उस दिन मुझे रोटी खाने का कोई हक नहीं। 
 एक पूरी पीढ़ी को गहराई तक प्रभावित कर प्रेमचंद ने साहित्य की यथार्थवादी परंपरा की नींव रखी। उनका लेखन हिन्दी साहित्य की एक ऐसी विरासत है जिसके बिना हिन्दी के विकास का अध्ययन अधूरा होगा। वे एक संवेदनशील लेखक, सचेत नागरिक, कुशल वक्ता तथा सुधी (विद्वान) संपादक थे। बीसवीं सदी के पूर्वाद्ध में, जब हिन्दी में तकनीकी सुविधाओं का अभाव था, उनका योगदान अतुलनीय है। प्रेमचंद के बाद जिन लोगों ने साहित्य को सामाजिक सरोकारों और प्रगतिशील मूल्यों के साथ आगे बढ़ाने का काम किया, उनमें यशपाल से लेकर मुक्तिबोध तक शामिल हैं। प्रेमचंद हिन्दी और उर्दू के महानतम भारतीय लेखकों में से एक थे। उपन्यास के क्षेत्र में उनके योगदान को देखकर बंगाल के विख्यात उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने उन्हें उपन्यास सम्राट कहकर संबोधित किया था। प्रेमचंद ने हिन्दी कहानी और उपन्यास की एक ऐसी परंपरा का विकास किया जिसने पूरी सदी के साहित्य का मार्गदर्शन किया।
 प्रेमचंद जी एक सफल अनुवादक भी थे। उन्होंने दूसरी भाषाओं के जिन लेखकों को पढ़ा और जिनसे प्रभावित हुए, उनकी कृतियों का अनुवाद भी किया। लियो टाल्सटाय की कहानियाँ (1923), गाल्सवर्दी के तीन नाटकों का हड़ताल (1930), चाँदी की डिबिया (1931) और न्याय (1931) नाम से अनुवाद किया। प्रेमचंद ने अपने जीवन में तकरीबन 300 लघु कथायें और 14 उपन्यास, बहुत से निबंध और पत्र भी लिखे हंै। इतना ही नहीं उन्होंने बहुत से विदेशी साहित्यों का हिंदी अनुवाद भी किया है। 
  आम आदमी को उन्होंने अपनी रचनाओं का विषय बनाया और उसकी समस्याओं पर खुलकर कलम चलाते हुए उन्हें साहित्य के नायकों के पद पर आसीन किया। प्रेमचंद से पहले हिंदी साहित्य राजा-रानी के किस्सों, रहस्य-रोमांच में उलझा हुआ था। प्रेमचंद ने साहित्य को सच्चाई के धरातल पर उतारा। उन्होंने जीवन और कालखंड की सच्चाई को पन्ने पर उतारा। वे सांप्रदायिकता, भ्रष्टाचार, जमींदारी, कर्जखोरी, गरीबी, उपनिवेशवाद पर आजीवन लिखते रहे। उन्होंने कथा साहित्य द्वारा हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं को बराबरी के साथ अभिव्यक्ति दी। आजादी के आन्दोलन को उन्होंने अपनी लेखनी के द्वारा नई ऊर्जा दी। 
 प्रेमचंद ने हिन्दी में कहानी की एक परंपरा को जन्म दिया और एक पूरी पीढ़ी उनके कदमों पर आगे बढ़ी, दशक में रेणु, नागार्जुन और इनके बाद श्रीनाथ सिंह ने ग्रामीण परिवेश की कहानियाँ लिखी हैं, वो एक तरह से प्रेमचंद की परंपरा के तारतम्य में आती हैं। प्रेमचंद हिन्दी सिनेमा के सबसे अधिक लोकप्रिय साहित्यकारों में से हैं। सत्यजीत राय ने उनकी दो कहानियों पर यादगार फिल्में बनाईं। शतरंज के खिलाड़ी और सद्गति। उनके देहांत के दो वर्षों बाद सुब्रमण्यम ने सेवासदन उपन्यास पर फिल्म बनाई जिसमें सुब्बालक्ष्मी ने मुख्य भूमिका निभाई थी। मृणाल सेन ने प्रेमचंद की कहानी कफन पर आधारित ओका ऊरी कथा नाम से एक तेलुगू फिल्म बनाई जिसको सर्वश्रेष्ठ तेलुगू फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला। गोदान और गबन उपन्यास पर लोकप्रिय फिल्में बनीं। उनके उपन्यास पर बना टीवी धारावाहिक निर्मला भी बहुत लोकप्रिय हुआ था।
 आपने “प्रगतिशील लेखक संघ” की स्थापना में सहयोग दिया। आपका देहान्त 8 अक्टूबर 1936 में 56 वर्ष की आयु में हो गया। इस तरह वह दीप सदा के लिए बुझ गया जिसने अपनी जीवन की बत्ती को कण-कण जलाकर भारतीयों का पथ आलोकित किया। मरणोपरान्त, उनके बेटे साहित्यकार अमृत राय ने ‘कलम का सिपाही’ नाम से उनकी जीवनी लिखी है जो उनके जीवन पर विस्तृत प्रकाश डालती है। प्रेमचंद की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी श्रीमती शिवरानी ने उन पर एक किताब ‘प्रेमचंद घर में’ लिखी। प्रेमचंद की बहुत सी प्रसिद्ध रचनाआंे का उनकी मृत्यु के बाद इंग्लिश अनुवाद भी किया गया है।
 मुंशी प्रेमचंद ने अपने 19वीं सदी के अन्त में तथा 20वीं सदी के पूर्वाद्ध के युग की समस्याओं गुलामी, सांप्रदायिकता, जमींदारी, कर्जखोरी, गरीबी, जाति प्रथा, छूआछूत, ग्रामीण भारत की दुर्दशा आदि का समाधान अपनी लेखनी के द्वारा आजीवन करने का अथक प्रयास किया। प्रेमचंद जी के जन्म दिवस पर हमें विशेषकर कलम के सिपाहियों को 21वीं सदी के वैश्विक युग में विश्वव्यापी समस्याओं आतंकवाद, घातक शस्त्रों की होड़, प्रदुषण, ग्लोबल वार्मिंग, ड्रग्स की युवा पीढ़ी में बढ़ती प्रवृत्ति, मानव तस्करी आदि के समाधान देने वाले तथा विश्वव्यापी एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने वाले विश्व साहित्य की रचना करनी चाहिए। 
 मुंशी प्रेमचंद के जन्मदिवस पर ‘21वीं सदी - उज्जवल भविष्य’ तथा विश्वव्यापी समस्याओं का समाधान देने वाले मैं अपने आदर्श महान लेखक, कवि तथा गीतकार - युग ऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य, भारत सरकार द्वारा दिये जाने वाले तीसरे नागरिक सम्मान पद्मभूषण से सम्मानित कवि हरिवंश राय बच्चन, पद्मभूषण से सम्मानित महान गीतकार गोपालदास ‘नीरज’, विश्वविख्यात लेखक एवं भारत सरकार द्वारा दिये जाने वाले चैथे नागरिक सम्मान पद्मश्री से सम्मानित डा. श्याम सिंह ‘शशि’, पद्म भूषण सम्मान प्राप्त पटकथा तथा संवाद लिखने के लिए प्रसिद्ध श्री जावेद अख्तर, विश्व एकता की शिक्षा संसार के प्रत्येक बालक को उपलब्ध कराने के लिए 60 वर्षोंं से प्रयासरत डा. जगदीश गांधी, संसार के प्रत्येक वोटर को वोटरशिप दिलाने के लिए संघर्षरत श्री भरत गांधी, युवा भारत की पहचान विश्वविख्यात कवि श्री कुमार विश्वास आदि का सदैव ऋणी रहूँगा जो मुझे समस्त मानव जाति के लिए अपनी लेखनी के द्वारा 100 प्रतिशत योगदान देने के लिए सदैव प्रेरित करते रहते हैं। मुंशी प्रेमचंद के संघर्षमय जीवन का सन्देश था कि जब तक संसार के हर घर में उजियारा न हो जाये तब तक प्रत्येक विश्ववासी को अपना योगदान एक दीपक बनकर देते रहना है। 

बी-901, आशीर्वाद, उद्यान-2, एल्डिको, रायबरेली रोड, लखनऊ