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मंडल कमीशन के गठन से लेकर लागू होने तक की कहानी
August 7, 2020 • Havlesh Kumar Patel • National
प्रभाकर सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।
 
आज आपको तीस साल पुराने उसी आंदोलन की पूरा कहानी सुनाऊंगा जिसकी पटकथा इसके लागू होने के 12 साल पहले ही लिखनी शुरू हो गई थी। मोरारजी देसाई के नेतृत्व में बनी पहली गैर कांग्रेसी सरकार ने 20 दिसंबर 1978 को बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल की अगुवाई में एक आयोग बनाया, जिसे मंडल आयोग कहा गया। इस आयोग ने 12 दिसंबर1980 को अपनी रिपोर्ट पूरी कर दी, लेकिन उस समय तक मोरारजी देसाई की सत्ता जा चुकी थी और आपातकाल के बाद सत्ता से बाहर होने के बाद इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी हो चुकी थी। मंडल कमीशन ने सरकारी नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों को 27 फीसदी आरक्षण की सिफारिश की थी। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी को शासन चलाने का अवसर मिला, लेकिन उन्होंने भी कमीशन की सिफारिशें लागू नहीं की। साल 1989 में देश आम चुनाव के रंग में पूरी तरह रंगा हुआ था। ये वो दौर था जब बोफोर्स घोटाले के दाग से राजीव गांधी का दामन दागदार था और भ्रष्टाचार देश के सामने एक बड़ा मुद्दा बन चुका था। पहली बार देश के प्रधानमंत्री को किसी ने सीधे कटघरे में खड़ा किया था। आजादी के बाद पहली बार एक सत्ता पांच साल पूरे होने से पहले ही लड़खड़ा गई थी, जिसे दो तिहाई बहुमत हासिल था। मामला बोफोर्स तोप की खरीद में कमीशन खाने का था और आरोप लगाने वाला शख्स देश का रक्षा मंत्री वीपी सिंह था। 
जनता पार्टी की ढहने के बाद निराश जनता को वीपी सिंह में एक उम्मीद दिखाई थी। 1989 का चुनाव ही एक आंदोलन की शक्ल लेने लगा। बात 1989 की है। विश्वनाथ प्रताप सिंह का जादू देश के सिर चढ़कर बोल रहा था। राजा मांडा के नाम से विख्यात वीपी सिंह नौजवानों की उम्मीद बने हुए थे। लोकसभा और उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव एक साथ हो रहे थे तो फतेहपुर में नारा उछला था, 'राजा नहीं फकीर है देश की तकदीर है'। इस नारे ने गंगा-यमुना के दोआब में बसे जिले में ऐसा जादू किया था कि जनता दल ने सभी 6 सीटें वोटों के भारी अंतर से जीत ली थीं। फतेहपुर से ही सांसद बने वीपी सिंह बीजेपी से सशर्त और लेफ्ट से बिना किसी शर्त के समर्थन से देश के प्रधानमंत्री बन गए। 7 अगस्त 1990, तत्तकालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने का ऐलान संसद में किया तो देश जातीय समीकरण के उन्माद से झुलसने लगा। मंडल कमीशन की सिफारिश के मुताबिक पिछड़े वर्ग को सरकारी नौकरी में 27 फीसदी आरक्षण देने की बात कही गई। जो पहले से चले आ रहे अनुसूचित जाति-जनजाति को मिलने वाले 22.5 फीसदी आरक्षण से अलग था। 
मंडल कमीशन की सिफारिश
(मंडल कमीशन की सिफारिश- 27 %अभी तक मिलने वाला आरक्षण- 22.5%कुल आरक्षण- 49.5%) यानी नई आरक्षण नीति के बाद आरक्षण की सीमा 49.5 फीसदी तक पहुंच चुकी थी। पहले से बेरोजगारी और सिस्टम की खामियों से जूझ रहे नौजवानों के गुस्से में आरक्षण की नई नीति ने आग में घी डालने का काम किया। ये वो आग थी जिसने हिन्दुस्तान की सियासत का नक्शा हमेशा-हमेशा के लिए बदल दिया था। आरक्षण! जी हां, पिछड़े तबके की सामाजिक बदहाली के एवज में लाभ के हालात या कहें बराबरी में खड़े होने की सुविधा, लेकिन फैसले सामाजिक न्याय के लिए नहीं बल्कि सियासी तिकड़मों के लिए थे। हालात बिगड़े औऱ बिगड़ते हालातों को थामने की जगह हालात और बिगाड़ने की राजनीति शुरू हो गई, क्योंकि ये आंदोलन सत्ता पाने और सत्ता बदलने का मजबूत हथियार बन गया था। देखते-देखते समूची हिंदी पट्टी जातीयवाद के नाम पर बंट गई। 
देश में फैली आरक्षण की आग
दिल्ली विश्वविद्यालय, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, जेएनयू, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, पटना विश्वविद्यालय समेत देश के 22 कालेजों के छात्र आरक्षण मुद्दे पर सड़कों पर निकल आए। आंदोलन को जितना दबाने की कोशिश की गई, वो उतना ही उग्र होता गया। इस आंदोलन को कुचलने के लिए पुलिस ने लाठी, गोली और आंसू गैस का सहारा लिया तो सड़कें खून से लाल होने लगीं। समाज टुकड़ों में बंटने लगा और बंटते-बंटते लहू-लुहान होना भी शुरू हो गया। सवर्ण तबके के छात्रों ने वीपी सिंह हाय हाय, मंडल कमीशन डाउन डाउन के नारे लगाने शुरू कर दिए तो पुलिस प्रशासन का डंडा उन पर कहर बनकर टूटने लगा। कई छात्रों ने विरोध में खुद को आग लगा ली। वीपी सिंह के इस फैसले ने देश की सियासत बदल दी। सवर्ण जातियों के युवा सड़क पर उतर आए। आरक्षण विरोधी आंदोलन के नेता बने राजीव गोस्वामी ने आत्मदाह कर लिया। कई हमेशा-हमेशा के लिए अपनी पहचान खोते चले गए तो कई नए नेता उभरे जिनकी पहचान की बुनियाद जातिवादी वोटबैंक पर टिकी थी।
सब से दूर दिल्ली की राजनीति ये अच्छी तरह से जानती थी कि आरक्षण का तीर उनके लिए वोट बैंक का ब्रह्मास्त्र हो जाएगा। क्योंकि मंडल कमीशन से उपजी आरक्षण नीति का सबसे ज्यादा असर उत्तर भारत पर पड़ा। लालू, मुलायम, मायावती, पासवान जैसे नेता क्षेत्रीय क्षत्रप बनते चलते गए, वक्त के साथ लालू और मुलायम मजबूत होते गए और अपने-अपने राज्यों में ये नेता पिछड़ों की राजनीति से पलायन करते करते सिर्फ और सिर्फ अपनी जाति की राजनीति करने लगे। कांग्रेस पार्टी ने वीपी सरकार के फैसले की पुरजोर मुखालफत की और राजीव गांधी मणिशंकर अय्यर द्वारा तैयार प्रस्ताव लेकर आए, जिसमें मंडल कमीशन की रिपोर्ट को पूरी तरह से खारिज किया गया। जिस वक्त यह फैसला आया तब वीपी सिंह की सरकार को बीजेपी बाहर से सशर्त समर्थन दे रही थी। लेकिन राजीव गोस्वामी से मिलने जब तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी एम्स अस्पताल पहुंचे तो उन्हें अगड़ी जाति के नौजवानों के तीखे विरोध का सामना करना पड़ा। आडवाणी ने वक्त की नजाकत को भांपा और उसके बाद मंडल के जवाब में कमंडल की राजनीति तेज कर दी।
देखते ही देखते दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र वोट बैंक की सियासत में ऐसे फंसा कि सत्ता के तंत्र जातीय तंत्र को ही मजबूत करने में लग गए। दो तरह के विचार इससे उपजे। एक ने कहा कि ये राष्ट्रीय राजनीति की गुलामी का मुक्ति पत्र है तो दूसरे ने कहा कि ये क्षेत्रिय अस्मिता को राष्ट्रीय पहचान दिलाकर राष्ट्रीयता की सोच खारिज करने वाला दौर है। दोनों हालातों में राजनीति ही सबसे ऊपर थी। और बोफोर्स घोटाले के नाम वाला पुर्जा वीपी सिंह की जेब में दबा ही रह गया। मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के खिलाफ अखिल भारतीय आरक्षण विरोधी मोर्चे के अध्यक्ष उज्जवल सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। उज्जवल सिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने यह मामला नौ न्यायाधीशों की पीठ को सौंप दिया। 16 नवंबर 1992 को सुप्रीम कोर्ट ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए मंडल आयोग की सिफारिश को लागू करने के फैसले को सही ठहराया।  इसी याचिका की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की अधिकतम सीमा 49.5 प्रतिशत तक कर दी। 
मंडल कमीशन की सिर्फ 2 सिफारिशें लागू
आपको पता है कि मंडल कमीशन यानी द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग की ज्यादातर सिफारिशें अभी भी धूल फांक रही हैं। कमीशन की उन सिफारिशों पर भी नजर डालते हैं जिन्हें लागू करने को लेकर चर्चा नहीं होती...
1. खुली प्रतिस्पर्धा में मेरिट के आधार पर चुने गए ओबीसी अभ्यर्थियों को उनके लिए निर्धारित 27 प्रतिशत आरक्षण कोटे में समायोजित नहीं किया जाए।
2. ओबीसी आरक्षण सभी स्तरों पर प्रमोशन कोटा में भी लागू किया जाए।
3. संबंधित प्राधिकारियों द्वारा हर श्रेणी के पदों के लिए रोस्टर व्यवस्था उसी तरह से लागू की जानी चाहिए, जैसा कि एससी और एसटी के अभ्यर्थियों के मामले में है।
4. सरकार से किसी भी तरीके से वित्तीय सहायता पाने वाले निजी क्षेत्र के सभी प्रतिष्ठानों में कर्मचारियों की भर्ती उपरोक्त तरीके से करने और उनमें आरक्षण लागू करने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए।
5. इन सिफारिशों को प्रभावी बनाने के लिए यह जरूरी है कि पर्याप्त वैधानिक प्रावधान सरकार की ओर से किए जाएं, जिसमें मौजूदा अधिनियमों, कानूनों, प्रक्रिया आदि में संशोधन शामिल है, जिससे वे इन सिफारिशों के अनुरूप बन जाएं।
6. शैक्षणिक व्यवस्था का स्वरूप चरित्र के हिसाब से अभिजात्य है। इसे बदलने की जरूरत है, जिससे यह पिछड़े वर्ग की जरूरतों के मुताबिक बन सके।
7. अन्य पिछड़े वर्ग के विद्यार्थियों को शिक्षा प्राप्त करने में सुविधा देने के लिए अलग से धन का प्रावधान किया जाना चाहिए, जिससे अलग से योजना चलाकर गंभीर और जरूरतमंद विद्यार्थियों को प्रोत्साहित किया जा सके और उनके लिए उचित माहौल बनाया जा सके।
8. ज्यादातर पिछड़े वर्ग के बच्चों की स्कूल छोड़ने की दर बहुत ज्यादा है। इसे देखते हुए प्रौढ़ शिक्षा के लिए एक गहन एवं समयबद्ध कार्यक्रम शुरू किया जाना चाहिए, जहां ओबीसी की घनी आबादी है। पिछड़े वर्ग के विद्यार्थियों के लिए इन इलाकों में आवासीय विद्यालय खोले जाने चाहिए, जिससे उन्हें गंभीरता से पढ़ने का माहौल मिल सके। इन स्कूलों में रहने खाने जैसी सभी सुविधाएं मुफ्त मुहैया कराई जानी चाहिए, जिससे गरीब और पिछड़े घरों के बच्चे इनकी ओर आकर्षित हो सकें।
9. ओबीसी विद्यार्थियों के लिए अलग से सरकारी हॉस्टलों की व्यवस्था की जानी चाहिए, जिनमें खाने, रहने की मुफ्त सुविधाएं हों।
10. ओबीसी हमारी शैक्षणिक व्यवस्था की बहुत ज्यादा बर्बादी की दर को वहन नहीं कर सकते, ऐसे में यह बहुत जरूरी है कि उनकी शिक्षा बहुत ज्यादा व्यावसायिक प्रशिक्षण की ओर झुकी हुई हो। कुल मिलाकर सेवाओं में आरक्षण से शिक्षित ओबीसी का एक बहुत छोटा हिस्सा ही नौकरियों में जा सकता है। शेष को व्यावसायिक कौशल की जरूरत है, जिसका वह फायदा उठा सके |
 
शोध छात्र इलाहाबाद विश्वविद्यालय उत्तर प्रदेश।