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नज़ीर
July 16, 2020 • Havlesh Kumar Patel • Himachal
प्रीति शर्मा "असीम", शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।
 
चंद्रकांत पांडे,  जिसे बबलू पांडे भैया कहकर पुकारता था। टीवी के हर चैनल पर सब उसके खूंखार अपराधी हत्यारे होने का सबूत दे रहे थे ।जबकि बार-बार उसकी आंखों के सामने चंद्रकांत पांडे का चेहरा सामने आ रहा था जब उसने आखिरी बार उसे देखा था। उसके चेहरे और आंखों में इतनी मायूसियत थी। वह खूंखार अपराधी जिसे मीडिया आंतकवादी भगोड़े का नाम दे रही थी जिस पर दो लाख का इनाम पुलिस रख  चुकी थी। उसकी जिंदगी का सच यह था जिसे हर पाटी अपने साथ मिलना चाहती थी, क्योंकि वह इनके लिए वोट इकट्ठी करने का माध्यम था और हर पार्टी एक से एक लालच देकर उसे अपनी तरफ करना चाहती थी उसको अपने हाथ की कठपुतली बनाने के लिए एक पार्टी से दूसरी पार्टी नें कैसे मोहरा बनाकर आज एक खूंखार अपराधी घोषित कर दिया था।          
           आज वह हार गया था, क्योंकि हर तरफ से उसके हाथ में सिर्फ मौत थी। वह लोग जो वोटों के लिए उसे चुनाव के दौरान सर पे उठाते के पांडे भैया.... पांडे भैया होती थी ।मीडिया में उसे हत्यारा कातिल अपराधी बता रहे है। उसे अपने चंगुल में फसाने के लिए किस प्रकार एक के बाद एक घटना उसे अपराधी बनाते हुए मौत की राह पर ले आई थी, जहां उसके लिए मौत के सिवाय कुछ नहीं था। "बबलू को याद आया" उस ने कहा था। भाई ....तू भाग जा। जब कि वो भी जानता था सिस्टम से भाग के वो कहीं नहीं जा पाएगा, क्योंकि वह एक ऐसा मोहरा बन चुका है, जो राजनेताओं के सफेद कपड़ों पर दाग बनकर बोल सकता है, इसलिए हर कोई अब उसे अपने रास्ते से हटाना चाहता है। उसे कॉलेज के वे दिन याद आये। किस प्रकार भाई कॉलेज में युवा दल का नेता सब भाई को कितना मानते थे। भाई सबकी मदद करता। सबके लिए दिन- रात काम करता था। कितना उत्साह और जोश से भरा रहता था। सबकी मदद करने के लिए वही आज खुद से हार गया है। बार-बार उसका मायूस चेहरा उसकी आंखों के सामने आ जाता है।
         जब उसने अपनी आंखों में अपने विश्वास की मौत होते देखी। सच में कैसे किसी को इस्तेमाल किया जाता है। अपने मकसद के लिए और मकसद निकलते ही आपकी छवि कैसे बनती और बिगड़ती है। आप जिस छवि को सोच रहे थे कि सब आपको कितना मानते है। इज्जत देते है, जबकि कोई आपको कठपुतली की तरह आपका तमाशा दिखाकर आपको इस्तमाल कर रहा होता है। इसी उधेड़बुन  में सारी रात वो सो नहीं सका। बार-बार उसका आखिरी चेहरा उसकी आंखों के सवाल उसे झनजोड़ रहे थे। बबलू! तू बच जाओगे। गांव चला जा। पार्टी -बाजी में कुछ नहीं रखा। सुबह हो रही थी, बबलू चारपाई से खड़ा हुआ। कुंडी की आवाज़ सुनके अम्मा उठ खड़ी हुई, पूछा- कहां जा रहा है। मां! मैं खेतों में जा रहा हूं। अम्मा हैरान हुई पर बोली नहीं। जो खेतों का कभी नाम नहीं लेता था, आज खेतों की बात कर रहा है। चाय बना दूं अम्मा बोली। नहीं ,मैं आता हूं। बबलू खेतों में चला गया। खेत में बैठ के फूट-फूट से रोया। उसने पंप के पास से मिट्टी खोदने शुरु की एक बड़ी बोरी जो हथियारों से भरी थी, निकाली और खींचते हुए उसे कुएं के पास लेकर आया और उसे कुएं में फैंक दिया। आज उसे एहसास हो रहा था, जिस मिट्टी में मौत बीजने की सोच रहा था, वह तो सबका पेट भर के जिंदगी देती है। उसने हल निकालना और मिट्टी से वादा किया कि वह जिंदगी को मेहनत की जिंदगी देगा ना कि फरेब की।
 
नालागढ़, हिमाचल प्रदेश