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सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ा है बड़ागांव सांंगरी का शनचा मेला
August 1, 2020 • Havlesh Kumar Patel • Himachal

डा हिमेंद्र बाली, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

शिमला हिल्ज स्टेट्स की अठारह ठकराईयों में एक सांगरी शिमला जिले की कुमारसैन तहसील में स्थित है। 15 अप्रैल 1948 से पूर्व सांगरी रियासत की राजधानी बड़ागांव में थी। रियासती काल से पूर्व यहां मवानों की छोटी-छोटी शासकीय सत्ताएं थी। लगभग सोलहवीं शताब्दी में सिरमौर के राजवंश के ठाकुर ने मवानों को पराजित कर सांगरी में अपनी सत्ता सम्भाली। सांगरी के किले में ठाकुर ने अपने इष्ट वर्षा के देव थानेश्वर की प्रतिष्ठा की। अठारहवीं शताब्दी के आरम्भ में कुल्लू के राजा मानसिंह ने सांगरी को बुशैहर से छीन लिया, परन्तु 1722 में मान सिंह की मृत्यु के बाद पुन:सांगरी बुशैहर के अधीन हो गई। सन् 1803 में गोरखों ने सांगरी पर अधिकार कर लिया। सन् 1815 में अंग्रजों के हाथों गोरखों की पराजय के बाद अंग्रेजों का आधिपत्य स्थापित हुआ। सन् 1842 में जगरसिंह जो कुल्लू के राज परिवार से था, सांगरी का शासक बना। जग्गर सिंह के बाद 1876 में हीरा सिंह राजा बना, उसी ने बड़ागांव शनचा मेले का आरम्भ किया।

कहते हैं कि एक बार राजा बनाहर गांव बैठा था, उसने सुकेत के तेबन गांव के समीप पेकू में चल रहे शनचा मेले में बज रहे बाजे की आवाज सुनी तो उसके मंत्री ने बताया कि यह शनचा मेला है। आप भी यहां अपना शनचा मेला लगा सकते हो। सुकेत में यह मेला दो अगस्त को था। हीरा सिंह ने अपने बड़प्पन को दिखाने के लिए बड़ागांव में तीस इक्कतीस जुलाई को अगामी वर्ष से आयोजित करने की ठान ली। शनचा मेले में बड़ागांव के अधिपति ब्रह्मेश्वर महादेव इलकी भाग लेते हैं। 29 जुलाई को देवता का अर्द्ध श्रृंगार होता है। 30 जुलाई को देवता का पूर्ण श्रृंगार है, इस दिन देवता के गुरू भाई बनाहर के बानेश्वर देवता का बड़ागांव में आगमन होता है। इस दिन छोटी शनचा होती है। दोनों देव नृत्य करते हैं, फिर अपने थड़ों पर विराजमान होते हैं। लोग देवताओं का आशीर्वाद पाने के लिए उमड़ पड़ते हैं। रात्रि में दोनों देव कोठी के समीप देवरे में विराजते हैं, ब्राह्मण कुल की वंधुएं देवताओं की स्तुति में देव गीत गाती हैं। अगले दिन बड़ी शनचा में दोनों देव कोठी के समीप मेला स्थल बनाड़ में फिर अाते हैं। लोमहर्षक देव नृत्य होता है, फिर देवता थड़े पर बैठकर मेले की शोभा बढ़ाते हैं। शाम को बानेश्वर देवता इलकी देवता से विदा लेते हैं, देव इलकी भी अपनी कोठी में चले जाते हैं। हालांकि इस बार कोरोना के चलते शनचा नहीं हो रहा है, अन्यथा हर परिवार दूर क्षेत्र से शनचा में जरूर शामिल होते हैं।

प्रधानाचार्य राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय नारकण्डा.