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संवेदनाओं को खोता नया एजुकेशन सिस्टम
September 21, 2020 • Havlesh Kumar Patel • Himachal
प्रीति शर्मा "असीम", शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।
 
 जैसे-जैसे स्कूलों-कॉलेजों का जमावड़ा हुआ है। वैसे- वैसे ही शिक्षा अपने मूल अस्तित्व भाव, संवेदना और महत्व को खोती जा रही है। महत्व को शायद इसलिए खोती जा रही है, क्योंकि लोगों को सुविधाएं देने के लिए सरकारों ने स्कूल तो खोल दिए हैं, लेकिन लोगों को प्रशिक्षित करने का जो मूल उद्देश्य है, उससे अनभिज्ञ ही रही है। हर स्तर पर एक भेद -भाव पूर्ण शिक्षा नीतियों का  उद्गम हो चुका है। प्राइवेट स्कूलों की होड़ में सरकारी स्कूल सुविधाएं देते हुए भी अछूत जान पड़ते हैं। 
       लोगों की मानसिकता यह है कि सरकारी स्कूल में गरीब लोगों के ही बच्चे पढ़ते हैं, इसलिए मध्यम वर्गीय परिवार अपने स्टेटस सिंबल को देखते हुए सरकारी स्कूलों का रुख नहीं करता चाहते, चाहे आधी से ज्यादा तनख्वाह अंग्रेजी स्कूल का पेट भरने में चली जाए। नई शिक्षा नीति ने मौलिकता और नैतिकता के स्तर में भारी गिरावट की है। बच्चे संवेदना से  रहित हो गए हैं। उनकी संवेदनाओं की समाप्ति का सबसे बड़ा कारण प्रतियोगिता है। अंको के मापदंड पर बच्चों की अच्छी विषय में दाखिला हो पाना, आरक्षण की वजह से कई बार 80% वाला विद्यार्थी रह जाता है और 50 % वाला आरक्षण की वजह से दाखिला ले लेता है। नौकरियों का भी वही हाल है, जिससे कुछ बच्चों और अभिभावक बच्चे को प्रेशर में डालकर कि पढ़ो- पढ़ो ज्यादा नंबर लाओगे, तब ही आप अच्छी जगह दाखिला ले पाओगे। बच्चा किताबों के बीच सारी संवेदनाएं भूल जाता है, लेकिन सिस्टम की इस खींचातानी और रैंकिंग की वजह से बहुत से बच्चेें  सही प्रतिशत नहीं ला पाते तो आत्महत्या की ओर बढ़ जाते हैं। जो बच्चे  दिमागी रूप से मध्यम होते हैं, वे  इन स्कूलों की शिक्षा नीतियों से अपना वास्तविक हुनर भी गंवा बैठते हैं कि उन्हें शिक्षा पाठ्यक्रम का कुछ नहीं आता। उनके मानसिक स्तर  को और भी गिरा देता है, लेकिन दिमाग में बैठी प्राइवेट स्कूलों में बच्चा भेजने की ललक कितने प्रतिशत बच्चों को अच्छा भविष्य दे पाती है, इसका आंकलन करने की कभी किसी ने कोशिश नहीं की। 
 मैं आपको अपना एक प्राइवेट स्कूल का अनुभव बताती हूं, जहां बस शिक्षा के नाम पर पाठ्य -क्रम पूरा करने की दौड़ लगी रहती है और बच्चे का मानसिक विकास हो रहा है, या नहीं इस और कोई ध्यान नहीं जाता। वह अधूरा ही रह जाता है, लेकिन स्कूल यही दिखाने में लगे रहते हैं कि बच्चा बहुत अच्छा पढ़ रहा है, बहुत सी एक्टिविटी में भाग ले रहा है। मानसिक विकास करने के लिए क्विज हो रहा है। सांस्कृतिक कार्यक्रम, शारीरिक विकास के लिए खेल हो रहे है, लेकिन कितने बच्चे इन सब में भाग ले पाते हैं, जो कह पाते हैं या कुशल होते हैं, वह तो  भाग ले लेते हैं, लेकिन जो अंतर्मुखी होते हैं, कक्षा में बैठे ही रह जाते हैं। 40 -40 बच्चों की भरी क्लास में टीचर 35 मिनट के पीरियड में कितने बच्चों को देख पाता होगा, कितनों को महसूस कर पाता होगा कि इसकी आंतरिक शक्तियां क्या है। यह क्या कर सकता है, सिर्फ पाठ्यक्रम को सही ढंग से करने करने वाला बच्चा ही होशियार नहीं हो सकता, लेकिन टीचर भी पाठ्यक्रम को खत्म करने की होड़ में लगा रहता है। 
 सिस्टम ने ऐसी व्यवस्था कर दी है कि दसवीं कक्षा तक किसी को फेल नहीं करना है, बच्चों को स्कूल का डर नहीं है। समय मैंने देखा है कि बच्चे जानते हैं कि टीचर हाथ नहीं लगा सकते, चाहे वह जितना भी शरारत कर ले। स्कूल प्रशासन द्वारा भी कहा जाता है कि आप किसी भी बच्चे को पीट नहीं सकते। इसका नतीजा यह है कि 5 % बच्चों ही हैं, जो संवेदनाएं रखते हैं। बाकी तो ऐसे लगते हैं, जैसे जंगल से आए हो, टीचर कितना भी सीखा ले, वह सीखने को तैयार नहीं है। वह ना तो टीचर की सुनते हैं, ना ही अपने परिवार की सुनते हैं। संवेदन शून्य यह विद्यार्थी भविष्य में किस समाज की नींव रखेंगे, यह नई शिक्षा नीति इस बात से अपरिचित कैसे से रह सकती है।  
 कोरोना काल में शिक्षा का माध्यम व्हाट्सएप, मोबाइल से हो रहा है। अभिभावक पहले मोबाइल से परेशान थे, अब सारा काम ही मोबाइल से हो रहा है। बच्चों को एक मौका मिल गया है, वह पढ़ते तो नहीं है, लेकिन फोन से पढ़ने का बहाना बहुत ठोस हो गया है। देश में जिस तरह बेरोजगारी का हाल है, शिक्षा रोजगार रोजगार दिलाने में सक्षम हो सकेगी या प्रधानमंत्री की  विकास योजनाओं में पकौड़े ही निकालती रह जाएगी, यह तो भविष्य ही बताएगा। 
नालागढ़, हिमाचल प्रदेश