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शिक्षकों को न्याय पाने के लिए सीधे नहीं जाना पडेगा हाईकोर्ट, शीघ्र गठित होगा राज्य शैक्षिक अभिकरण (शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र के वर्ष 12, अंक संख्या-23, 04 जनवरी 2016 में प्रकाशित लेख का पुनः प्रकाशन)
July 27, 2020 • Havlesh Kumar Patel • OLD


शि.वा.ब्यूरो, लखनऊ। परिषदीय स्कूलों तथा अनुदानित बेसिक व माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षकों व शिक्षणोतर कर्मचारियों को निकट भविष्य में अपने सेवा संबंधी मामलों के लिए सीधे हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की जरूरत नहीं होगी। ऐसे मामलों की सुनवाई मंडल स्तर पर गठित होने वाले मंडलीय शैक्षिक अधिकरण में हो सकेगी।
हाई कोर्ट में बेसिक और माध्यमिक शिक्षकों के सेवा संबंधी मुकदमों की बढ़ती संख्या से चिंतित राज्य सरकार ने ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए उत्तर प्रदेश राज्य शैक्षिक अधिकरण गठित करने का फैसला किया है। माध्यमिक शिक्षा विभाग ने इसका खाका तैयार कर लिया है। इसके तहत प्रत्येक मंडल स्तर पर रिटायर्ड जिला जज की अध्यक्षता में मंडलीय शैक्षिक अधिकरण गठित किया जाएगा। मंडलीय शैक्षिक अधिकरण में अध्यक्ष के अलावा उपाध्यक्ष ;न्यायिकद्ध व उपाध्यक्ष ;प्रशासनिकद्ध के एक-एक पद तथा सदस्य ;न्यायिकद्ध व सदस्य ;प्रशासनिकद्ध के तीन-तीन पद होंगे।
शिक्षक व शिक्षणोतर कर्मचारी वेतन भुगतान, सेवानिवृत्ति से जुड़े लाभ, अनुशासनिक व विभागीय कार्रवाई, पदोन्नति, पद से हटाये जाने आदि सेवा संबंधी मामलों के मुकदमे सीधे हाई कोर्ट में नहीं दाखिल कर सकेंगे।  उन्हें ऐसे वाद मंडलीय शैक्षिक अधिकरण में दायर करने होंगे। मंडलीय शैक्षिक अधिकरण के फैसले के खिलाफ वे राजधानी में प्रस्तावित राज्य शैक्षिक अधिकरण में अपील कर सकेंगे।
राज्य शैक्षिक अधिकरण की अध्यक्षता हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त जज करेंगे। यदि हाई कोर्ट के सेवारत जज को राज्य शैक्षिक अधिकरण का अध्यक्ष बनाया जाएगा तो नियुक्ति से पहले उन्हें सेवा से इस्तीफा देना होगा। अध्यक्ष के अलावा राज्य शैक्षिक अधिकरण में उपाध्यक्ष ;न्यायिकद्ध व उपाध्यक्ष ;प्रशासनिकद्ध में से प्रत्येक का एक तथा सदस्य ;न्यायिकद्ध व सदस्य ;प्रशासनिकद्ध के तीन-तीन पद होंगे। राज्य शैक्षिक अधिकरण के निर्णय के पुनरीक्षण के लिए शिक्षक व शिक्षणोत्तर हाई कोर्ट में दस्तक दे सकेंगे।
प्रमुख सचिव माध्यमिक शिक्षा जितेंद्र कुमार ने बताया कि उप्र राज्य शैक्षिक अधिकरण विधेयक के प्रारूप को कैबिनेट से मंजूरी दिलाने के बाद प्रस्तावित अधिनियम के बारे में हाई कोर्ट की सहमति ली जाएगी। हाई कोर्ट की सहमति पर विधेयक को विधानमंडल से पारित कराकर लागू किया जाएगा। 
ज्ञात हो कि बेसिक और माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षकों व शिक्षणेतर कर्मचारियों के सेवा संबंधी लगभग बीस हजार मुकदमे हाई कोर्ट में विचाराधीन हैं। शैक्षिक अधिकरण गठित होने पर हाई कोर्ट पर ऐसे मुकदमों का बोझ कम हो जाएगा, वहीं शिक्षकों व शिक्षणोतर कर्मचारियों को सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि उन्हें अपने सेवा संबंधी मामलों की सुनवाई के लिए हाई कोर्ट न जाकर मंडल स्तर पर वाद दाखिल करने का फोरम सुलभ होगा। इसमें समय और धन कम खर्च होगा और अनावश्यक भागदौड़ भी बचेगी। शिक्षा अधिकारियों को भी आये दिन हाई कोर्ट के चक्कर नहीं लगाने होंगे।