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शिवपुराण से....... (245) गतांक से आगे.......रूद्र संहिता (प्रथम सृष्टिखण्ड़)
June 26, 2020 • Havlesh Kumar Patel • National

भगवान् शिव की श्रेष्ठता तथा उनके पूजन की अनिवार्य आवश्यकता का प्रतिपादन .........

गतांक से आगे............

उत्तम कुल में भी आचारवान् ब्राह्मणों के यहां उत्पन्न होना उत्तम पुण्य से ही सम्भव है। यदि वैसा जन्म सुलभ हो जाये तो भगवान् शिव के संतोष के लिए उस उत्तम कर्म का अनुष्ठान करें, जो अपने वर्ण और आश्रम के लिए शास्त्रों द्वारा प्रतिपादित है। जिस जाति के लिए जो कर्म बताया गया है, उस उल्लंघन न करें। जितनी सम्पत्ति हो, उसके अनुसार ही दान करें। कर्ममय सहस्रों यज्ञों से तपोयज्ञ बढ़कर है। सहस्रों तपायज्ञों से जपयज्ञ का महत्व अध्कि है। ध्यानयज्ञ से बढ़कर कोई वस्तु नहीं है। ध्यान ज्ञान का साध्न है, क्योंकि योगी ध्यान के द्वारा अपने इष्टदेव समरस शिव का साक्षात्कार करता है। 
ध्यानयज्ञात्परं नास्ति ध्यानं ज्ञानस्य साध्नम्। 
यतः समरसं स्वेष्टं योगी ध्यानेन पश्यति।।
ध्यानयज्ञ में तत्पर रहने वाले उपासक के लिए भगवान् शिव सदा ही संनिहित हैं। जो विज्ञान से  सम्पन्न हैं, उन पुरूषों की शुद्धि के लिए किसी प्रायश्चित आदि की आवश्यकता नहीं है। 
मनुष्य को जब तक ज्ञान की प्राप्ति न हो, तब तक वह विश्वास दिलाने के लिए कर्म से ही भगवान् शिव की आराधना करे। जगत् के लिए लोगों को एक ही परमात्मा अनेक रूपों में अभिव्यक्त हो रहा है।    

(शेष आगामी अंक में)