देवी उमा का हिमवान् के हृदय तथा मेना के गर्भ में आना, गर्भस्था देवी का देवताओं द्वारा स्तवन, उनका दिव्य रूप में प्रादुर्भाव, माता मेना से बातचीत तथा नवजात कन्या के रूप में परिवर्तित होना
वे सब देवता अपने-अपने धाम को चले गये। जब नवां महीना बीत गया और दसवां भी पूरा हो चला, तब जगदम्बा कालिका ने समय पूर्ण होने पर गर्भस्थ शिशु की जो गति होती है, उसी को धारण किया अर्थात जन्म ले लिया। उस अवसर पर आद्याशक्ति सती-साध्वी शिवा पहले मेना के सामने अपने ही रूप से प्रकट हुई। वसन्त ट्टतु में चैत्र मास की नवमी तिथि को मृगशिरा नक्षत्र में आधी रात के समय चन्द्रमण्डल से आकाशगंगा की भांति मेनका के उदर से देवी शिवा का अपने ही स्वरूप में प्रादुर्भाव हुआ। उस समय सम्पूर्ण संसार में प्रसन्नता छा गयी। अनुकूल हवा चलने लगी, जो सुन्दर सुगन्धित एवं गम्भीर थी। उस समय जल की वर्षा के साथ फूलों की वृष्टि हुई। विष्णु आदि सब देवता वहां आये। सबने सुखी होकर प्रसन्नता के साथ जगदम्बा के दर्शन किये और शिवलोक में निवास करने वाली दिव्यरूपा महामाया शिवकामिनी मंगलमयी कालिका माता का स्तवन किया।
नारद! जब देवता लोग स्तुति करके चले गये, तब मेनका उस समय प्रकट हुई नील कमल-दल के समान कान्ति वाली श्याम वर्णा देवी को देखकर अतिशय आनन्द का अनुभव करने लगीं। देवी के उस दिव्य रूप का दर्शन करके गिरिप्रिया मेना को ज्ञान प्राप्त हो गया। वे उन्हें परमेश्वरी समझकर अत्यन्त हर्ष से उल्लसित हो उठी और संतोषपूर्वक बोली। (शेष आगामी अंक में)