शिवपुराण से (रूद्र संहिता तृतीय पार्वती खण्ड) (476) गतांक से आगे......

देवी उमा का हिमवान् के हृदय तथा मेना के गर्भ में आना, गर्भस्था देवी का देवताओं द्वारा स्तवन, उनका दिव्य रूप में प्रादुर्भाव, माता मेना से बातचीत तथा नवजात कन्या के रूप में परिवर्तित होना 

मेना ने कहा- जगदम्बे! महेश्वरि! आपने बड़ी कृपा  की, जो मेरे सामने प्रकट हुईं। अम्बिके! आपकी बड़ी शोभा हो रही है। शिवे! आप सम्पूर्ण शक्तियों में आद्याशक्ति तथा तीनों लोकों की जननी हैं। देवि! आप भगवान् शिव को सदा ही प्रिय हैं तथा सम्पूर्ण देवताओं से प्रशंसित पराशक्ति हैं। महेश्वरि! आप कृपा करें और इसी रूप से मेरे ध्यान में स्थित हो जायें। साथ ही मेरी पुत्री के अनुरूप प्रत्यक्ष दर्शनीय रूप धारण करें।

ब्रह्माजी कहते हैं- नारद! पर्वत-पत्नी मेना की यह बात सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुई शिवा देवी ने उस गिरिप्रिया को इस प्रकार उत्तर दिया।

देवी बोलीं- मेना! तुमने पहले तत्परतापूर्वक मेरी बड़ी सेवा की थी। उस समय तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हो मैं वर देने के लिए तुम्हारे निकट आयी। वर मांगो, मेरी इस वाणी को सुनकर तुमने जो वर मांगा, वह इस प्रकार है- महादेवि! आप मेरी पुत्री हो जायें और देवताओं का हित-साधन करें। तब मैंने तथास्तु कहकर तुम्हें सादर यह वर दे दिया और मैं अपने धाम को चली गयी। गिरिकामिनी! उस वर के अनुसार समय पाकर आज में तुम्हारी पुत्री हुई हूं। आज मैंने जो दिव्य रूप का दर्शन कराया है, इसका उद्देश्य इतना ही है कि तुम्हें मेरे स्वरूप का स्मरण हो जाये, अन्यथा मनुष्य रूप मे प्रकट होने पर मेरे विषय में तुम अन्जान ही बनी रहती।                      (शेष आगामी अंक में)

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