शिवपुराण से (रूद्र संहिता तृतीय पार्वती खण्ड) (476) गतांक से आगे......

देवी उमा का हिमवान् के हृदय तथा मेना के गर्भ में आना, गर्भस्था देवी का देवताओं द्वारा स्तवन, उनका दिव्य रूप में प्रादुर्भाव, माता मेना से बातचीत तथा नवजात कन्या के रूप में परिवर्तित होना 

अब तुम दोनों दम्पत्ति पुत्रीभाव से अथवा दिव्यभाव से मेरा निरन्तर चिन्तन करते हुए मुझमें स्नेह रखो। इससे मेरी उत्तम गति प्राप्त होगी। मैं पृथ्वी पर अद्भुत लीला करके देवताओं का कार्य सिद्ध करूंगी। भगवान् शम्भु की पत्नी होऊंगी और सज्जनों का संकट से उद्धार करूंगी।

ऐसा कहकर जगन्माता शिवा चुप हो गयीं और उसी क्षण माता के देखते-देखते प्रसन्नतापूर्वक नवजात पुत्री के रूप में परिवर्तित हो गयीं।            (अध्याय 6)

पार्वती का नामकरण और विद्याध्ययन, नारद का हिमवान् के यहां  जाना, पार्वती का हाथ देखकर भावी फल बताना, चिन्तित हुए हिमवान् को पार्वती का विवाह शिवजी के साथ करने को कहना और उनके संदेह का निवारण करना

ब्रह्माजी कहते हैं- नारद! मेना के सामने महातेजस्वनी कन्या होकर लौकिक गति का आश्रय ले वह रोने लगी। उसका मनोहर रूदन सुनकर घर की सब स्त्रियां हर्ष से खिल उठीं और बड़े वेग से प्रसन्नतापूर्वक वहां आ पहुंची। नील कमल-दल के समान श्याम कान्तिवाली उस परम तेजस्विनी और मनोरम कन्या को देखकर गिरिराज हिमालय अतिशय आनन्द में निमग्न हो गये।                (शेष आगामी अंक में)

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